नयी दिल्ली, 31 अगस्त उच्चतम न्यायालय की जेल सुधार समिति ने कहा है कि देश भर की जेलों में कैदियों के रहने की जगह की स्थिति ‘दयनीय’ है और जेलों में कैदियों की भीड़ की समस्या के समाधान के लिए त्वरित सुनवाई एक प्रभावी साधन बन सकती है।
उच्चतम न्यायालय में दायर रिपोर्टों के अपने अंतिम सारांश में, शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अमिताव रॉय की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा है कि जेलों में रहने की स्थिति ‘मॉडल जेल मैनुअल, 2016’ के तहत परिकल्पित स्थितियों के अनुरूप नहीं है और इसके लिए तत्काल ध्यान देना जरूरी है।
उसने कहा कि 30 नवंबर, 2018 की स्थिति के अनुसार भारत की कुल 1,341 जेलों में कैदियों की संख्या 122 प्रतिशत है जिनमें 644 उप-जेल, 402 जिला जेल एवं अन्य कारागार हैं।
समिति ने खचाखच भरे कारावासों के लिए कुछ कारकों का उल्लेख किया है जिनमें कैदियों की संख्या बढ़ने की तुलना में जेलों के बुनियादी ढांचे में ठहराव, अवसंरचना में विस्तार या सुधार की पहल नहीं होना, छोटे-मोटे अपराधों के लिए आरोपियों को कारावासों में डाला और जांच एवं मुकदमों में देरी शामिल हैं।
उसने कहा कि जेलों में कैदियों की भीड़ पर प्रथम प्रारंभिक रिपोर्ट में अध्ययन के लिए 12 राज्यों का चयन किया गया था और इसके निष्कर्षों के अनुसार जिला कारागारों में कैदियों की संख्या सर्वाधिक रही जो 148 प्रतिशत थी। इसके बाद केंद्रीय कारागारों में 129 प्रतिशत और उप-कारावासों में 106 प्रतिशत कैदी हैं।
27 दिसंबर, 2022 की रिपोर्ट के अंतिम सारांश में नौ अध्याय हैं जिनमें कारावासों में अधिक भीड़, जेलों में अप्राकृतिक मृत्यु, ट्रांसजेंडर कैदी पर अध्याय हैं।
समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति (यूटीआरसी) प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है।
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