देश की खबरें | तमिलनाडु के मंत्री बालाजी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तीन न्यायाधीशों के सामने रखें: न्यायालय

नयी दिल्ली, चार जुलाई उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए खंडित फैसले के मद्देनजर मंगलवार को अदालत को निर्देश दिया कि वह तमिलनाडु के गिरफ्तार मंत्री वी. सेंथिल बालाजी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को “जल्द से जल्द” तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखे।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यह भी कहा कि बालाजी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर नई पीठ द्वारा शीघ्रता से निर्णय लिया जाना चाहिए।

इससे पहले दिन में मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने बालाजी की याचिका पर खंडित आदेश दिया था।

न्यायमूर्ति जे. निशा बानू और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने बालाजी को कथित तौर पर ‘‘अवैध तरीके से हिरासत’’ में लिये जाने के खिलाफ उनकी पत्नी की ओर से दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया।

न्यायमूर्ति जे. निशा बानू ने बालाजी को रिहा करने को कहा, तो न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने इससे असहमति जतायी।

इसके बाद खंडपीठ ने रजिस्ट्री को मुख्य न्यायाधीश के सामने मामला रखने का निर्देश दिया ताकि इसे तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

सुनवाई की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत की पीठ से कहा कि चूंकि उच्च न्यायालय ने खंडित फैसला सुनाया है, इसलिए मामले को अंतिम फैसले के लिए शीर्ष अदालत में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

मेहता ने कहा, “मेरी मुश्किल यह है कि हर दिन सबूतों से छेड़छाड़ होगी। यह विशुद्ध रूप से कानून का सवाल है और कोई भी तथ्य विवादित नहीं है। एकमात्र सवाल यह है कि क्या न्यायिक हिरासत पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की जा सकती है।”

उन्होंने कहा कि यह प्रभावशाली व्यक्ति का मामला है और अगर नुकसान होता है तो इसकी भरपाई नहीं हो पाएगी।

बालाजी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि एक खंडपीठ के खंडित फैसले के बाद, मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा गया है और उन्होंने मेहता के अनुरोध का विरोध किया।

उन्होंने पूछा कि उच्च न्यायालय को नजरंदाज कैसे किया जा सकता है? उन्होंने कहा, “किसी मुद्दे पर दो न्यायाधीशों के बीच मतभेद है और स्वाभाविक परिणाम यह है कि मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के पास जाएगा।”

सिब्बल ने आगे कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में अदालत इस मामले को शीर्ष अदालत में लाने का निर्देश नहीं दे सकती।

पीठ ने कहा कि वह उच्च न्यायालय से कानून के सवालों पर जल्द से जल्द फैसला देने का अनुरोध करेगी।

मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई को तय की गई। पीठ ने कहा , “यह कानून का सवाल है। हम इस पर फैसला करेंगे और अगर तीन जजों की राय होगी तो इससे हमें ही मदद मिलेगी।”

बालाजी को राहत देते हुए शीर्ष अदालत ने 21 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के आग्रह के बावजूद उन्हें इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति देने के, मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

ईडी ने राज्य के परिवहन विभाग में कथित नौकरी के बदले नकदी घोटाले के सिलसिले में बालाजी को गिरफ्तार किया था। उसने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था।

गिरफ्तारी के बाद बालाजी (47) की बुधवार को चेन्नई के एक निजी अस्पताल में कोरोनरी बाईपास सर्जरी की गई और बताया जाता है कि उनकी हालत ठीक है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की अवकाशकालीन पीठ ने कहा था कि बालाजी की पत्नी द्वारा उनकी (बालाजी की) “अवैध” गिरफ्तारी के खिलाफ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अब भी उच्च न्यायालय में लंबित है। पीठ ने ईडी से कहा था कि वह उच्च न्यायालय के समक्ष जाए।

इसने संज्ञान लिया कि उच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की विचारणीयता और बालाजी के अस्पताल में रहने की अवधि को हिरासत में पूछताछ के लिए निचली अदालत द्वारा दी गई रिमांड की अवधि से बाहर करने के ईडी के अनुरोध पर अपना अंतिम फैसला सुनाना बाकी था।

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