नयी दिल्ली, 16 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर अनुरोध किया गया है कि भवन निर्माण के क्षेत्र में ग्राहकों को बिल्डर और उनके एजेन्टों से संरक्षण प्रदान करने तथा रियलटी सेक्टर के कारोबार में पारदर्शिता लाने के लिये रियल इस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) कानून, 2016 के अनुरूप एक ‘आदर्श करार ’ का प्रारूप तैयार करने का केन्द्र को निर्देश दिया जाये।
यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है। इसमें सभी राज्यों को ‘मॉडल बिल्डर-बायर करार’ और ‘मॉडल एजेन्ट-बायर समझौता’ लागू करने तथा ग्राहकों को मानसिक, शारीरिक और वित्तीय परेशानियों से बचाने के लिये कदम उठाने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
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याचिका के अनुसार, ‘‘प्रमोटर्स, बिल्डर्स और एजेन्ट मनमाने तरीके से एकतरफा समझौता बनाते हैं जिसमे ग्राहकों को समान स्थिति में नहीं रखा जाता है जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन होता है। मकान खरीदारों को कब्जा सौंपने में अत्यधिक विलंब और ग्राहकों द्वारा शिकायत दर्ज करने के अनेक मामले हैं, लेकिन पुलिस समझौते के मनमाने प्रावधानों का हवाला देते हुये प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है।’’
अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में यह भी कहा गया है, ‘‘बिल्डर बार बार मकान का कब्जा देने की तारीख में बदलाव करते हैं और अनुचित प्रतिबंधित व्यवहार करते हैं। यह सभी आपराधिक साजिश, छल, धोखाधड़ी, विश्वासघात, बेईमानी सरीखा होता है और इससे कार्पोरेट नियमों का उल्लंघन होता है।
याचिका के अनुसार मकान का कब्जा देने में जानबूझ कर देरी की वजह से ग्राहकों को मानसिक और वित्तीय परेशानियों का ही सामना नहीं करना पड़ता है, बल्कि यह उनके जीने और आजीविका के अधिकारों का उल्लंघन करता है।
याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि परियोजना समय से पूरी नहीं होने की वजह से ग्राहकों को मकान का कब्जा मिलने में विलंब होने की स्थिति में उन्हें मुआवजा दिलाने का निर्देश भी दिया जाए।
अनूप
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