मातृ दिवस: माँ के यथार्थ चित्रण को लेकर सजग हुआ बॉलीवुड
45 साल बाद भी, सलीम-जावेद द्वारा लिखी फिल्म ‘‘दीवार’’ का संवाद- ‘‘मेरे पास माँ है’’ बेहद लोकप्रिय है। फिल्म में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच का वह दृश्य आज भी लोगों को याद है, जिसमें आपस में लड़ते बेटों के बीच एक बेबस माँ को दिखाया गया है, जिसमें मां का किरदार निरूपा रॉय ने निभाया है।
मुंबई, 10 मई क्रांतिकारी फिल्म ‘मदर इंडिया’ की नर्गिस, 'मदर ऑफ बॉलीवुड’ निरूपा रॉय से लेकर ‘हेलिकॉप्टर ईला’ में काजोल और फ़िल्म ‘‘द स्काई इज पिंक’’ में प्रियंका चोपड़ा द्वारा निभाया गया माँ का किरदार यही बताता है कि बॉलीवुड में समय के साथ-साथ माताओं का चित्रण भी बदलता गया। नये जमाने की फिल्मों में अब माँ के यथार्थ चित्रण पर अधिक जोर दिया जा रहा है। बॉलीवुड इसको लेकर अब पहले से कहीं ज्यादा सजग है।
45 साल बाद भी, सलीम-जावेद द्वारा लिखी फिल्म ‘‘दीवार’’ का संवाद- ‘‘मेरे पास माँ है’’ बेहद लोकप्रिय है। फिल्म में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच का वह दृश्य आज भी लोगों को याद है, जिसमें आपस में लड़ते बेटों के बीच एक बेबस माँ को दिखाया गया है, जिसमें मां का किरदार निरूपा रॉय ने निभाया है।
एक समय था जब मां सामाजिक उलझनों, घर की चार दीवारी में ही उलझी नजर आती थीं, फिल्मों में बस उन्हें भावुकता से जोड़कर ही दिखाया जाता था, लेकिन आज के समय की मां का किरदार एकदम हटकर देखने को मिल रहा है। बदलते दौर में फिल्मों में मां खिलाड़ी, वैज्ञानिक, इंजीनियर, बिजनसमैन और सामाजिक सरोकार से संबंध रखने वाली महिला के तौर सामने आयी है। वह घर के कामकाज के साथ साथ परिवार और उनकी जिम्मेदारी भी उठाती नजर आई और समाज में भी खुद को सशक्त बनाती दिखीं।
प्रौद्योगिकी के इस युग में पुरुषों के साथ खड़ी नजर आती हैं, बिजनेस में पति का साथ देती हुई दिखाई देती हैं। जैसे फिल्म ‘मिशन मंगल’ में विद्या बालन का निभाया एक वैज्ञानिक का किरदार ।
महबूब ख़ान द्वारा लिखी और निर्देशित फिल्म ‘मदर इंडिया’ हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई। फिल्म में मां का किरदर नर्गिस ने निभाया। राधा के तौर पर मां की भूमिका में वह महिलाओं की दुर्दशा, भेद-भाव जैसे कई विषयों के साथ जूझती नजर आती हैं। लेकिन आज की फिल्मों में अगर सांड की आंख में तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर की भूमिकाओं को देखा जाए तो, ये गांव से जुड़ी दो महिलाओं की सच्ची कहानी को दर्शाती है। कैसे इन दोनों किरदारों ने सामाजिक व गांव के तमाम बंधनों को तोड़कर अपना सपना मुकम्मल किया।
इस मातृ दिवस पर, लेखक मृण्मयी लागू वायकुल, जूही चतुर्वेदी, अभिनेत्री सीमा पाहवा, लेखक-निर्देशक नूपुर अस्थाना और फिल्मकार प्रदीप सरकार ने बताया कि कैसे हिंदी सिनेमा में माताओं का चित्रण बदला है।
फिल्म ‘थप्पड़ की सह-लेखिका वायकुल, का मानना है कि माताओं को अक्सर एक कहानी में भावनात्मक अपील को बाहर लाने के लिए उपयोग किया जाता रहा है।
उन्होंने पीटीआई- से कहा, ‘‘एक माँ का चित्रण इस बात पर निर्भर करता है कि फिल्म में उसे किस रूप में दिखाने की कोशिश हो रही है। लेखक के रूप में हमें समाज में जो चल रहा है, उसे चित्रित करना चाहिए और फिर इसे प्रेरणादायक बनाने की कोशिश करनी चाहिए या शायद हकीकत दिखानी चाहिए।’’
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(The above story first appeared on LatestLY on May 10, 2020 08:42 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

