नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए वर्ष 2005 में बने कानून को ‘मील का पत्थर’ करार देते हुए बृहस्पतिवार कहा कि इस देश में उनके खिलाफ इस तरह के अपराध ‘तेजी से फैले हैं’ और वे किसी न किसी रूप में रोजाना हिंसा का सामना करती हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला ने पूरे जीवन एक बेटी, बहन, पत्नी, मां और साथी या अकेली औरत के तौर पर कभी भी खत्म नहीं होने वाली हिंसा और भेदभाव के चक्र का त्याग कर दिया है।
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उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘ वर्ष 2005 में लागू हुआ कानून इस देश की महिलाओं की रक्षा के लिए मील का पत्थर है।
अदालत ने कहा, ‘‘इस देश में घरेलू हिंसा बढ़ी है और कई महिलाएं किसी न किसी रूप में या लगभग रोजाना हिंसा का सामना करती हैं। हालांकि, इस क्रूर व्यवहार की सबसे कम रिपोर्ट दर्ज होती है।’’
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शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाएं अपने खिलाफ हिंसा का प्रतिकार उनके मुद्दों को सुलझाने वाले कानून की कमी, मौजूदा कानूनों की अनदेखी की वजह से नहीं करतीं और सामाजिक बर्ताव से वे सबसे अधिक असुरक्षित हो जाती हैं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने एक विवाहित महिला को ससुराल के घर में रहने के मामले में राहत देते हुए की।
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