नयी दिल्ली,19 सितंबर भारतीय और जर्मन वैज्ञानिकों के एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि बड़े पैमाने पर होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट भारतीय मानसून को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकते हैं।
मानसून एक ऐसी वार्षिक परिघटना है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा लेकर आती है।
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पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले संस्थान भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) ,पुणे और जर्मनी के पोट्सदम जलवायु प्रभाव अनुसंधान संस्थान (पीआईके) ने यह भी पाया है कि बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी परिघटनाएं सूखा या अत्यधिक वर्षा जैसी मौसम पद्धति की दिशा में ले जा सकती हैं।
आईआईटीएम के जलवायु परिवर्तन अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक आर कृष्णन ने कहा कि ज्वालामुखी विस्फोट होने के बाद उससे निकलने वाले सूक्ष्म कण और गैस वायुमंडल के समतापमंडल में पहुंच जाते हैं और वहां कुछ वर्षों तक मौजूद रहते हैं।
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उन्होंने कहा कि, ‘‘ज्वालामुखी विस्फोट से निकली राख के कण समतापमंडल में सूर्य के प्रकाश को कुछ हद तक पृथ्वी की सतह पर पहुंचने से रोक देते हैं, इस तरह कम प्रकाश पहुंचने से अगले साल ‘अल-नीनो’ परिघटना की संभावना बढ़ जाती है। ’’
अल-नीनो, एक ऐसी परिघटना है जो प्रशांत महासागर के जल के गर्म होने से संबद्ध है। व्यापक रूप से यह भी माना जाता है कि इसका भारतीय मानसून पर प्रभाव पड़ता है।
कृष्णन ने कहा, ‘‘ऐसा इसलिए होता है कि कम प्रकाश का मतलब है कम उष्मा और इस तरह उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान में अंतर के बदलाव के कारण वायुमंडलीय परिसंचरण (सर्कुलेशन) और वर्षण की मात्रा प्रभावित होती है। ’’
अध्ययन में कहा गया है कि ताजा आंकड़ों के निष्कर्ष से अब यह खुलासा हुआ कि बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी विस्फोट होने से प्रशांत महासागर के ऊपर और भारतीय मानसून पर गर्म अल-नीनो का संयोग बढ़ने की संभावना होती है। इससे सूखा पड़ने की संभावना बढ़ती है, जबकि इसके उलट प्रशांत महासागर के ऊपर ‘ला-नीना’ परिघटनाओं के होने से अत्यधिक बारिश हो सकती है। ’’
वहीं, जर्मन संस्थान के नोरबर्त मरवान ने कहा कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर और भारतीय मानसून के बीच संबंधों में समय के साथ बदलाव आया है, इसके लिये ग्लोबल वार्मिंग एक कारण है। इसके चलते मानसून का सटीक अनुमान नहीं लग पा रहा।
उन्होंने कहा कि मानसून के बारे में ये नये निष्कर्ष भारत में कृषि कार्यों की योजना बनाने के लिये अहम हैं।
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