देश की खबरें | जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने पीएसए के तहत जारी कई हिरासत आदेश रद्द किए

श्रीनगर, 20 अप्रैल जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत पत्रकार फहद शाह सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ जारी हिरासत आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि “हिरासत प्राधिकार ने अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया।”

श्रीनगर निवासी पीरजादा मोहम्मद वसीम की हिरासत से जुड़े एक मामले में अदालत ने डोजियर में यह कहने के लिए जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई कि आरोपी 2020 में दंगे और पथराव में शामिल था, जबकि वह 2017 से जेल में है।

न्यायाधीश ने सवाल किया कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो पहले से ही जेल में है, उस अवधि में दंगे और पथराव में कैसे शामिल हो सकता है।

न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल ने अपने आदेश में कहा कि “इससे स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि हिरासत प्राधिकार ने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना यह आदेश जारी किया है।”

उन्होंने कहा, “मैंने हिरासत के आधार का बारीकी से अध्ययन किया है, जिससे पता चलता है कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकरण ने यह कहकर दिमागी अस्थिरता का प्रदर्शन किया है कि हिरासत में लिए गए लोगों की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के प्रतिकूल हैं।”

न्यायमूर्ति नरगल ने आगे कहा कि प्राधिकारियों ने सार्वजनिक व्यवस्था में खलल के खतरे के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने की आ‍वश्यकता का ‘अस्थिर दिमाग से और बिना किसी आधार के अनिश्चितता’ के कारण हिरासत के आधार के रूप में इस्तेमाल किया है।

न्यायमूर्ति नरगल ने उच्चतम न्यायालय के वर्ष 1980 के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ‘कानून एवं व्यवस्था’, ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘राज्य की सुरक्षा’ अलग-अलग अवधारणाएं हैं, लेकिन ये हमेशा अलग नहीं होतीं।

उन्होंने अपने आदेश में शीर्ष अदालत के वर्ष 1980 के आदेश को उद्धृत करते हुए कहा कि शांति का हर उल्लंघन कानून एवं व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने के बराबर हो सकता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने के बराबर नहीं होता और सार्वजनिक व्यवस्था में हर गड़बड़ी ‘राज्य की सुरक्षा’ को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं कर सकती है।

आमिर अली भट नाम के एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ पीएसए के तहत जारी निरोध आदेश को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति नरगल ने कहा, “स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी की ओर से हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ हिरासत आदेश पारित करने के दौरान आधार सामग्री उपलब्ध कराने में विफलता हिरासत आदेश को कानून की नजर में अवैध और टिकने योग्य नहीं बना देती है।”

पत्रकार फहद शाह के मामले में न्यायमूर्ति नरगल ने कहा कि रिकॉर्ड का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को डोजियर प्रदान नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि “डोजियर की आपूर्ति न किया जाना हिरासत की मुख्य चूक में से एक है” और इससे हिरासत आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)