ताजा खबरें | बीमा चर्चा चार अंतिम रास

पटेल ने कहा कि ऐसी कंपनियों को मिलने वाली राशि के उपयोग व उन पर नियंत्रण के संबंध में कोई स्पष्टता नहीं है। उन्होंने सरकार से जल्दबाजी में इसे पारित नहीं कराने और इस पर व्यापक चर्चा कराने की मांग की।

शिवसेना के अनिल देसाई ने कहा कि एफडीआई के बिना भी बीमा क्षेत्र का विकास हो सकता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने संसाधन मौजूद हैं और सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करे।

तेदेपा सदस्य के रवींद्र कुमार ने भी बीमा क्षेत्र में एफडीआई बढ़ाए जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि सरकार को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

भाजपा के सुशील कुमार मोदी ने विधेयक के प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि 74 प्रतिशत की सीमा अनिवार्य या बाध्यकारी नहीं है और यह कंपनियों पर निर्भर करेगा कि उन्हें एफडीआई लेना है या नहीं। उन्होंने कहा कि अभी बैंकों में 74 प्रतिशत एफडीआई है और उसका कोई दुष्परिणाम सामने नहीं आया है।

सुशील कुमार मोदी ने कहा कि एफडीआई के बाद भी कंपनियों का प्रबंधन भारतीयों के पास ही रहेगा और 50 प्रतिशत निदेशक भारतीय ही रहेंगे। उन्होंने कहा कि यह आशंका सही नहीं है कि एफडीआई करने वाली कंपनियां भारतीय पैसे देश से बाहर ले जाएंगी। उन्होंने कहा कि इस संबंध में पहले से ही सुरक्षा के पर्याप्त उपाय मौजूद हैं और कोई कंपनी यहां से पैसे बाहर नहीं ले जा सकती।

उन्होंने कहा कि बीमा जोखिम भरा कारोबार है और इसमें तरलता की कमी है। ऐसे में बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में निवेश करने में दिलचस्पी नहीं लेते हैं। उन्होंने कहा कि विधेयक लाए जाने से पहले विस्तृत चर्चा की गयी थी और बीमा नियामक आईआरडीए ने विभिन्न पक्षों के साथ कई दौर की चर्चा की।

भाजपा सदस्य ने कहा कि 2000 में बीमा क्षेत्र में सुधार किया गया और उसके बाद बीमा कंपनियों की संख्या सात से बढ़कर 56 हो गयी।

चर्चा में कांग्रेस सदस्य अमी याज्ञनिक, बीजद के अमर पटनायक, भाजपा के सैयद जफर इस्लाम, भाकपा के विनय विश्वम और आप के संजय सिंह ने भी भाग लिया।

अविनाश मनीषा

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