नयी दिल्ली, 14 सितंबर भारत 2050 तक ऊर्जा के लिये मांग का सबसे बड़ा स्रोत होगा जबकि वैश्विक स्तर पर जो निरंतर वृद्धि हो रही थी, उस पर अंकुश लगेगा। बीपी पीएलसी ने सोमवार को सालाना ऊर्जा परिदृश्य 2020 में यह बात कही।
वहीं तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने कहा कि विकासशील देशों को कोरोना वायरस महामारी को रोकने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे वैश्विक स्तर पर खासकर भारत में तेल मांग पर असर पड़ेगा।
बीपी की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर तेल खपत कोरोना वायरस संकट के पहले के स्तरों पर संभवत: कभी नहीं लौटे।
रिपोर्ट में तीन परिदृश्यों पर विचार किया गया है - 'रैपिड' दृष्टिकोण के तहत नए नीतिगत उपायों से कार्बन की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जबकि शुद्ध कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की पहल 'नेट जीरो’ से सामाजिक व्यवहार में बड़े स्तर पर बदलाव आएगा। वहीं मौजूदा गतिविधियों को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि सरकार की नीतियां, तकनीक और सामाजिक प्राथमिकताएँ पूर्व की तरह आगे बढ़ती रहेंगी।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि तीनों परिदृश्य में भारत 2050 तक मांग में वृद्धि का सबसे बड़ा स्रोत होगा।
इसमें कहा गया है कि भारत की प्राथमिक ऊर्जा खपत 2018 से 2050 के दौरान 2.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। यह चीन के मामले में 0.1 प्रतिशत और वैश्विक स्तर पर 0.3 प्रतिशत के मुकाबले बेहतर है।
इस बीच, ओपेक ने कहा कि विकासशील देशों को कोरोना वायरस महामारी को रोकने में समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इससे वैश्विक स्तर पर खासकर भारत में तेल की मांग में कमी आएगी।।
ओपेक ने इस साल और अगले साल के लिये वैश्विक मांग में 400,000 बैरल प्रतिदिन की कमी का अनुमान को संशोधित किया है। नये अनुमान के अनुसार अब इसमें 2020 में 95 लाख बैरल प्रतिदिन और 2021 में 66 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आएगी।
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