नयी दिल्ली, 26 दिसंबर (360इन्फो) कल्पना कीजिए कि आप किसी वेबसाइट पर एक महत्वपूर्ण समाचार लेख पढ़ना शुरू करते हैं और आपके स्क्रीन पर एक संदेश चमकता है जिसमें पूरे लेख को पढ़ने के लिए मोटी फीस मांगी जाती है। कम से कम कहने के लिए यह परेशान करने वाला होगा।
अधिकतर वैज्ञानिकों के लिए यह एक वास्तविकता है। जब तक वे प्रकाशक को शुल्क का भुगतान नहीं करते, तब तक उन्हें अपने अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक जानकारी देने वाली वैज्ञानिक पत्रिकाओं से बाहर कर दिया जाता है।
और ये शुल्क महंगाई की तुलना में कई सौ गुना अधिक स्तर तक बढ़ गए हैं।
वर्ष 2020 में मिसौरी यूनिवर्सिटी लाइब्रेरियन की गणना के अनुसार, ये शुल्क 1983 की तुलना में ‘नेचर’ जैसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिकाओं के लिए महंगाई के मुकाबले 113.78 गुना, ‘साइंस’ पत्रिका के लिए 189.18 गुना और ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ के लिए 244.49 गुना अधिक है।
दूसरे तरीके से कहें तो एनईजेएम के शुल्क में बढ़ोतरी ने मुद्रास्फीति को 24,339 फीसदी तक पीछे छोड़ दिया है।
भारतीय अनुसंधानकर्ता और अनुसंधान संस्थान सामूहिक रूप से हर साल वैज्ञानिक साहित्य के लिए पत्रिका अंशदान के रूप में लगभग 15 अरब रुपये (200 मिलियन अमेरिकी डॉलर) खर्च करते हैं, जो एक बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी लागत है और यह भारत के लिए ही विशिष्ट समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक दक्षिण के सभी देशों के लिए समान स्थिति है।
वैज्ञानिक प्रकाशन कई अरब डॉलर का उद्योग है जिस पर कुछ बड़े खिलाड़ियों का वर्चस्व है। शिक्षाविदों को अकसर सरकार से वित्तीय मदद मिलती है, अकसर वे करदाताओं द्वारा वित्त पोषित शोध करते हैं और फिर निजी स्वामित्व वाली पत्रिकाओं में शोध के बारे में पढ़ने के लिए करदाताओं के डॉलर का उपयोग करते हैं।
यह करदाताओं से निजी उद्योग के लिए धन का बड़े पैमाने पर हस्तांतरण है और प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए हाल में कई आह्वान किए गए हैं।
लेकिन प्रकाशकों से साहित्य को सबके लिए मुफ्त बनाने की उम्मीद करना एक अवास्तविक सपना है।
इसलिए, वैज्ञानिक समुदाय अधिक यथार्थवादी लक्ष्यों के लिए प्रयास कर रहा है और विज्ञान को सभी के लिए अधिक सुलभ बनाने के लिए तंत्र ढूंढ़ रहा है।
भारत की ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ (ओएनओएस) नीति ने काफी ध्यान आकर्षित किया है।
भारत के ओएनओएस मॉडल की बात पहली बार 2017 में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस द्वारा की गई थी और तीन साल बाद इसे सरकार की नीति में दर्ज किया गया। यह प्रकाशकों के साथ एक केंद्रीय समझौते वाले सदस्यता सौदे की बात करता है, यह सभी अनुसंधानकर्ताओं के लिए पढ़ने के वास्ते विद्वानों के लेख मुफ्त बनाता है, व्यक्तिगत या संस्थागत अंशदान की आवश्यकता को समाप्त करता है।
भारत की ओएनओएस नीति का उद्देश्य वैज्ञानिक साहित्य तक बेहतर पहुंच, वैज्ञानिक साक्षरता में वृद्धि और अनुसंधान अनुदान राशि के बेहतर उपयोग की अनुमति देना है। यदि नीति सफल होती है, तो यह दुनिया के अन्य हिस्सों के लिए एक ‘रोल मॉडल’ के रूप में काम करेगी और संभवत: इसे पूरे वैश्विक-दक्षिण में दोहराया जाएगा।
भारत ने नवंबर 2022 में ओएनओएस के कार्यान्वयन का पहला चरण शुरू किया, जिसमें अप्रैल 2023 से 70 प्रकाशकों के संसाधनों तक पहुंच पर विचार किया गया। इन प्रकाशकों के वास्ते केंद्रीय सदस्यता के लिए बातचीत जल्द ही शुरू होनी चाहिए।
लेकिन ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ को लागू करने की राह में अनिवार्य रूप से चुनौतियां होंगी।
इसकी सफलता सरकार और प्रकाशन गृहों के बीच सुविचारित वार्ता के जरिए किए गए सौदों पर निर्भर करेगी। अच्छे परिणाम सुनिश्चित करने के लिए सरकार को अनुभवी वार्ताकारों की एक टीम की आवश्यकता होगी।
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