देश की खबरें | लाजपत नगर मे 1996 में हुए विस्फोट मामले में न्यायालय ने चारों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई

नयी दिल्ली, छह जुलाई उच्चतम न्यायालय ने 1996 में लाजपत नगर में हुए बम विस्फोट मामले में चार दोषियों को कोई राहत दिए बगैर जीवन पर्यंत कारावास की सजा सुनायी और कहा कि उन्होंने विस्फोट करके भारत को ‘‘अस्थिर करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश’’ को अंजाम दिया था।

करीब 27 साल पहले हुए इस विस्फोट में 13 लोगों की मौत हुई थी और करीब 38 लोग घायल हुए थे।

मामले की गंभीरता पर विचार कर रही शीर्ष अदालत हालांकि, दोषियों को मौत की सजा सुनाने के अभियोजन पक्ष के अनुरोध पर राजी नहीं हुई। अभियोजन ने 21 मई, 1996 को हुए विस्फोट में निर्दोष लोगों की मौत का कारण बने इन दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी।

न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने अपने 190 पन्ने के फैसले में चारों दोषियों... मोहम्मद नौशाद, मिर्जा निसार हुसैन उर्फ नाजा, मोहम्मद अली भट उर्फ किल्ली और जावेद अहमद खान... को फैसले में हुई देरी के आधार पर मृत्युदंड नहीं सुनाया।

न्यायालय ने कहा कि यह अपराध ‘दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में आता है’ लेकिन निचली अदालत में 14 साल लंबी चली सुनवाई और फैसले में कुल 27 साल की देरी के कारण परिस्थितियां दोषियों के पक्ष में हैं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘घटना 21 मई, 1996 की है, करीब 27 साल पुरानी; निचली अदालत ने 22 अप्रैल 2010 में मृत्युदंड की सजा सुनाई, जिसको 13 साल से ज्यादा हो चुका है; और मौजूदा आरोपी, मुख्य षड्यंत्रकारियों के कहने पर काम कर रहे थे; इस अपराध के दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में आने के बावजूद उपरोक्त कारण और परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से मृत्युदंड नहीं दिया जा रहा है।’’

न्यायालय ने कहा, ‘‘निर्दोषों की जान लेने वाले अपराध की गंभीरता और प्रत्येक आरोपी की भूमिका को ध्यान में रखते हुए इन सभी आरोपियों को बिना किसी नरमी के जीवन पर्यंत उम्रकैद की सजा सुनायी जाती है। आरोपी अगर जमानत पर बाहर हैं तो तत्काल संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करें और उनके जमानती मुचलके रद्द किए जाते हैं।’’

उच्चतम न्यायालय ने दोषियों मिर्जा निसार हुसैन उर्फ नाजा, मोहम्मद अली भट उर्फ किल्ली को कारागार में आत्मसमर्पण करने और उम्रकैद की सजा काटने को कहा। इन दोनों को दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया था।

दोषियों के खिलाफ सुनवाई में देरी को लेकर न्यायालय का रूख बहुत आलोचनात्मक था और उसने कहा कि इससे ‘राष्ट्रीय हित’ प्रभावित हुआ है।

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