नयी दिल्ली, एक अगस्त उच्चतम न्यायालय ने बलात्कार के मामले में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पूर्व मुख्य सचिव जितेंद्र नारायण को प्रदान की गई जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला मंगलवार को सुरक्षित रख लिया।
नारायण के खिलाफ यह मामला 21 वर्षीय महिला ने दर्ज कराया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला की पीठ ने राज्य और पीड़िता के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद कहा, “आदेश सुरक्षित रखा जाता है।”
कलकत्ता उच्च न्यायालय की पोर्ट ब्लेयर सर्किट पीठ ने इस साल की शुरुआत में नारायण को जमानत प्रदान की थी, जिसके खिलाफ राज्य और पीड़िता ने अपील दायर की थीं।
विशेष जांच दल (एसआईटी) ने इस आरोप की जांच की थी कि महिला को सरकारी नौकरी का वादा करके मुख्य सचिव के आवास पर बुलाया गया और नारायण सहित कई लोगों ने उससे बलात्कार किया।
नारायण के खिलाफ पिछले साल एक अक्टूबर को प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जब वह दिल्ली वित्तीय निगम के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक थे। सरकार ने 17 अक्टूबर को उन्हें निलंबित कर दिया था। उन्हें 10 नवंबर को गिरफ्तार किया गया था।
एसआईटी ने इस मामले में तीन फरवरी को 935 पृष्ठ का आरोप पत्र दायर किया था।
अभियोजन पक्ष के वकील ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी कि पूर्व मुख्य सचिव को जमानत देने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
उन्होंने मामले में सीसीटीवी फुटेज समेत सबूतों को नष्ट करने का भी आरोप लगाया और कहा कि पीड़िता का बयान बलात्कार का मामला साबित करने के लिए पर्याप्त है।
आरोपी के वकील ने दावा किया कि उनके मुवक्किल को मामले में फंसाया गया है और इस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।
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