हाल में पेश हुए बजट में ऑरेंज इकॉनमी पर जोर देकर सरकार जेन-जी पर दांव लगा रही है. देश में जल्द ही अगले पीढ़ी के डिजिटल स्टोरीटेलर्स को प्रशिक्षण दिया जाएगा.छात्रों के लिए डिजिटल ड्रॉइंग, इलस्ट्रेशन, स्टोरीटेलिंग और गेमिंग अब सिर्फ शौक नहीं रह जाएगा. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026 पेश किया. इस दौरान उन्होंने ऑरेंज इकोनॉमी को भारत की उभरती आर्थिक शक्ति बताते हुए क्रिएटिव इंडस्ट्री को बढ़ावा देने पर जोर दिया है. सरकार का फोकस एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स (एवीजीसी) क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक अवसर पैदा करने पर है. साल 2030 तक इसमें 20 लाख पेशेवरों की जरूरत होगी.
मुंबई स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी (आईआईसीटी) की सहायता से 15,000 सेकेंडरी स्कूलों और 500 कॉलेजों में एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब स्थापित की जाएंगी ताकि छात्रों को शुरुआती स्तर से ही आधुनिक, डिजिटल और क्रिएटिव तकनीकों का प्रशिक्षण मिल सके. इसके लिए सरकार ने 250 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है. साथ ही पूर्वी भारत में राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान स्थापित किया जाएगा. एक राष्ट्रीय डिजिटल नॉलेज ग्रिड बनाने की भी घोषणा की गई है.
क्या है ऑरेंज इकॉनमी?
ऑरेंज इकॉनमी या क्रिएटिव इकॉनमी को अब उसी स्तर की प्राथमिकता और महत्व दिया जा रहा है जैसा 1990 के दशक में आईटी बूम के दौरान देखने को मिला था. यह कला, संस्कृति, डिजाइन और डिजिटल कंटेंट जैसे रचनात्मक क्षेत्रों पर आधारित है. इस तरह की अर्थव्यवस्था आइडिया, क्रिएटिविटी और टैलेंट पर जमी होती है.
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (यूएनसीटीएडी) की क्रिएटिव इकॉनमी आउटलुक रिपोर्ट 2024 के अनुसार क्रिएटिव या ऑरेंज इकॉनमी आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते आर्थिक क्षेत्रों में शामिल है. इस सेक्टर से हर साल दो ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का वैश्विक कारोबार हो रहा है. बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए कोलंबिया, जापान और फ्रांस जैसे कई देशों में क्रिएटिव इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए विशेष नीतियों, टैक्स इंसेंटिव और सरकारी फंडिंग की व्यवस्था बहुत पहले से है.
पहली बार भारत के बजट में ऑरेंज इकॉनमी का जिक्र किया गया है. लेकिन इसे पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ावा मिल रहा है. साल 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई में आयोजित वेव (वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट) समिट में हिस्सा लिया था.
इस सम्मेलन में 90 से अधिक देशों के दस हजार से अधिक प्रतिनिधि, 300 कंपनियां, एक हजार से ज्यादा कंटेंट क्रिएटर और 350 से अधिक स्टार्टअप मौजूद रहे. इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत फिल्म, डिजिटल कंटेंट, गेमिंग, फैशन, संगीत और लाइव मनोरंजन का वैश्विक हब बनता जा रहा है और आने वाले सालों में क्रिएटिव सेक्टर का जीडीपी में हिस्सा भी बढ़ेगा. क्रिएटर पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ें और भारतीय कहानियों को विश्व स्तर पर पेश करें."
सरकार के लिए जरूरी है ऑरेंज इकॉनमी
क्रिएटर-लेड न्यूज प्लेटफॉर्म विगर मीडिया को आईआईसीटी मुंबई के साथ इंक्यूबेट किया गया है. इसकी फाउंडर और सीईओ सोनम भगत ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव काफी समय से इस अर्थव्यवस्था में नए अवसर तलाश रहे थे. इस प्रक्रिया में मंत्रालय के सचिव संजय जाजू भी शामिल रहे.
वह कहती हैं, "आज 84 प्रतिशत जेन-जी अपने आप को कंटेंट क्रिएटर मानता है. सरकार एवीजीसी सेक्टर से जीडीपी योगदान बढ़ाकर 10 प्रतिशत तक लाना चाहती है. इस कदम से मैनेजमेंट और मार्केटिंग एजेंसियों को भी फायदा होगा."
भारत के ज्यादातर कंटेंट क्रिएटर इंस्टाग्राम, यूट्यूब और गूगल जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं. देश में फिलहाल अपना कोई बड़ा प्लेटफॉर्म नहीं है जो कंटेंट क्रिएटर के लिए ऑडियंस, ऑप्टिमाइजेशन और कमाई के अवसर पूरी तरह से दे सके. इसलिए ऑरेंज इकॉनमी को भारत में मोनेटाइज करना बेहद जरूरी बताया जा रहा है.
सोनम बताती हैं कि ओटीटी, फिल्म और म्यूजिक कॉन्सर्ट इंडस्ट्री ने अब इतना बड़ा प्रभाव पैदा कर लिया है कि यह वैश्विक स्तर पर ट्रेंड और संस्कृति को प्रभावित कर रही है. ऐसे में सरकार के लिए इसे अपने हाथ में लेना स्वाभाविक है.
वह आगे कहती हैं, "भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में शामिल है जहां इंटरनेट की खपत सबसे अधिक है. लेकिन यही प्लेटफॉर्म गलत सूचना और फेक न्यूज फैलाने का भी जरिया बन गए हैं. यह जरूरी है कि इस इंडस्ट्री को नियंत्रित और नियमित किया जाए ताकि कंटेंट क्रिएटर को सुरक्षित मंच मिले और देश के डिजिटल इकोसिस्टम को संतुलित रखा जा सके."
नौकरी नहीं, कंटेंट क्रिएशन में करियर ढूंढ रहे हैं जेन-जी
गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स कम्युनिटी प्लेटफॉर्म 'स्टेन' के सहसंस्थापक और सीओओ नौमान मुल्ला बताते हैं कि एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर्स के जरिए जेन-जी और मिलेनियल्स तक पहुंचना आसान है. स्मार्टफोन और इंटरनेट अब आसानी से उपलब्ध हैं. यही क्रिएटर भविष्य में उद्यमी भी बन सकते हैं.
कोविड-19 के दौरान घर पर सभी ने अपने पैशन को फॉलो करना शुरू किया. नौमान कहते हैं, "आज भारत में 50 करोड़ से अधिक गेमर हैं. कई ग्लोबल गेम कंपनियां जैसे फ्री फायर और बैटल रॉयल भारत में लगभग 60 मिलियन डॉलर का बिजनेस कर रही हैं."
स्वतंत्र शर्मा एमबीए के छात्र हैं और साथ में कंटेंट क्रिएशन कर रहे हैं. उनके मुताबिक जेन-जी किसी के नीचे काम करने के बजाय खुद के बॉस बनना चाहते हैं. यह पीढ़ी ज्यादा एक्सप्रेसिव और रचनात्मक है. सोशल मीडिया उनके लिए अपनी सोच, पहचान और टैलेंट को व्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में स्वतंत्र बताते हैं कि इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म बार-बार अपना एल्गोरिदम बदलते रहते हैं, जिससे कई बार वीडियो को व्यूज नहीं मिलते. इसका असर ब्रांड डील्स पर भी पड़ता है और मौके कम हो जाते हैं, इसके बावजूद युवाकॉर्पोरेट नौकरियां नहीं करना चाहते.
वह आगे कहते हैं, "अगर मुझे स्कूल के समय ही इस तरह की ट्रेनिंग मिल जाती, तो मेरा बहुत सारा समय बच जाता. अभी मुझे एडिटिंग, शूटिंग, कलर ग्रेडिंग और साउंड मिक्सिंग जैसे स्किल्स यूट्यूब से सीखने पड़ते हैं. इसमें मेरे रोज तीन से चार घंटे लग जाते हैं. पहले से तैयारी होती तो मैं ज्यादा बेहतर और कॉन्फिडेंट होता."
स्कूली शिक्षा में कंटेंट क्रिएशन चुनौती
आज लगभग हर सेक्टर में एनीमेशन और वीएफएक्स जैसे स्किल्स की मांग है. स्कूलों में कंटेंट क्रिएटर लैब की शुरुआत एक संरचनात्मक बदलाव है. दिल्ली पब्लिक स्कूल (वाराणसी, नासिक, नागपुर और पुणे) के प्रो-वाईस चेयरमैन गौतम राजगढ़िया का कहना है कि सोशल मीडिया क्रिएटर और इंफ्लुऐंसर की संख्या लगातार बढ़ रही है, "पहले छात्र खेल और बॉलीवुड सितारों को अपना आदर्श मानते थे. अब वे यूट्यूबर बनना चाहते हैं." यह समझना ज्यादा जरूरी है कि सरकार इस नीति को किस तरह लागू करेगी.
गौतम बताते हैं, "शहरी और बड़े स्कूलों के छात्र पहले से ही सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं और तकनीक का इस्तेमाल करना जानते हैं. लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में इसे लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी. यहां के कई छात्रों के पास अब भी स्मार्टफोन, लैपटॉप और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं."
गौतम की राय में स्कूलों का उद्देश्य केवल यूट्यूबर तैयार करना नहीं होना चाहिए और यह प्रोग्राम कक्षा नौ से नीचे के छात्रों के लिए आवश्यक नहीं है, "सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में गुस्से की समस्या बढ़ रही है. उनका धैर्य कम हो रहा है और नींद का पैटर्न भी प्रभावित हो रहा है. इसलिए इस तरह के प्रोग्राम को संतुलित और जिम्मेदारी के साथ लागू करना कठिन होगा."
गौतम कहते हौं कि इसमें शिक्षकों को प्रशिक्षित करना बहुत जरूरी होगा. उन्हें पता होना चाहिए कि छात्रों के लिए कौन-सा कंटेंट उपयोगी है और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि बच्चे गलत तरह का कंटेंट न देखें.
अपनी प्राथमिकता पर विचार करे सरकार
हालांकि अर्थशास्त्री और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार को अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करने की जरूरत है. अर्थशास्त्री मिताली निकोरे ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि कंटेंट क्रिएटर बनना सिखाया नहीं जा सकता, ऑडियंस से जुड़ने की कला स्वाभाविक रूप से आती है.
सबसे पहले सरकार को क्रिएटर्स को औपचारिक रूप से लेबर फोर्स का हिस्सा बनाना होगा. ब्रिटेन में कंटेंट क्रिएशन को लेकर एक स्पष्ट ढांचा मौजूद है. वहां क्रिएटर उसे माना जाता है जो अपने कार्य समय का 20 प्रतिशत से अधिक कंटेंट बनाने में लगाता है और उससे नियमित पैसे कमा रहा है. वहां टैक्सेशन को लेकर भी स्पष्ट नियम हैं. जबकि भारत में ज्यादातर क्रिएटर्स इसे साइड हसल या फ्रीलांसिंग की तरह कर रहे हैं.
मिताली बताती हैं, "250 करोड़ रुपये कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है. इसका उपयोग क्रिएटर्स और उद्यमियों को कम ब्याज वाले लोन देने में किया जा सकता था ताकि वे उपकरण खरीद सकें या शूट व काम करने के लिए जगह किराए पर ले सकें. इसके अलावा को-वर्किंग स्पेस और स्टूडियो जैसे बुनियादी ढांचे विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए." ऐसा करने से अधिक लोगों को लाभ मिलता, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के क्रिएटर को, जिनकी वीडियो की क्वॉलिटी में सुधार आ सकता है.
मिताली का मानना है कि इस समय सरकार की प्राथमिकता अन्य क्षेत्रों पर होनी चाहिए, "मेरे विचार से इसे स्कूल स्तर पर शुरू करने की आवश्यकता नहीं है. इसके बजाय कॉलेजों में वोकेशनल कोर्स शुरू करना एक बेहतर विकल्प होता." सरकार को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत है. बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बजट में कोई अलग फंड आवंटित नहीं किया गया है.













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