देश की खबरें | न्यायेतर स्वीकारोक्ति ठोस सबूत के अभाव में महत्व खो देती है : न्यायालय

नयी दिल्ली, 27 मई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सह-आरोपी की कथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति आरोपी के खिलाफ किसी भी ठोस सबूत के अभाव में अपना महत्व खो देती है और इस तरह की स्वीकारोक्ति के आधार पर कोई दोषसिद्धि नहीं हो सकती है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि एक न्यायेतर स्वीकारोक्ति ‘अधिक विश्वसनीयता और साक्ष्य मूल्य’ हासिल करती है, बशर्ते यह ठोस परिस्थितियों की एक श्रृंखला द्वारा समर्थित हो और अन्य अभियोजन साक्ष्य द्वारा इसकी पुष्टि होती हो।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने उस आरोपी को बरी कर दिया, जिसने हत्या के कथित अपराध के लिए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने आरोपी को निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने और आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की थी। इस फैसले को आरोपी ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसने आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘आरोपी के खिलाफ किसी भी ठोस सबूत के अभाव में, सह-आरोपी द्वारा कथित रूप से की गई न्यायेतर स्वीकारोक्ति अपना महत्व खो देती है और सह-आरोपी के इस तरह की न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर कोई दोष सिद्धि नहीं हो सकती है।’’

इसने कहा कि परिस्थितियों की वह श्रृंखला, जिस पर दोष का निष्कर्ष निकाला जाना है, पूरी तरह से स्थापित होनी चाहिए और आरोपी की बेगुनाही का कोई तार्किक आधार नहीं छूटना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के आरोप को साबित करने के उद्देश्य से अभियोजन पक्ष को प्राथमिक तथ्य के रूप में ‘मानव हत्या’ को स्थापित करना चाहिए।

पीठ ने अपीलकर्ता की अपील मंजूर करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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