नयी दिल्ली, 24 अक्टूबर दिल्ली की एक अदालत ने एक महिला को अंतरिम गुजारा भत्ता देने के खिलाफ की गयी अपील को रद्द करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत अंतरिम भरण-पोषण के प्रावधान का इरादा अदालत को ऐसे निर्देश पारित करने का अधिकार देता है, जो वह उचित और ठीक समझे।
एक मजिस्ट्रेट अदालत ने इस साल मार्च में महिला और उसके नाबालिग बच्चे को अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल पाहुजा एक व्यक्ति की उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें मजिस्ट्रेट के आदेश पर आपत्ति जताई गई थी। व्यक्ति ने दावा किया है कि वह प्रति माह 12,500 रुपये कमा रहा है इसलिए वह अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं दे सकता।
मजिस्ट्रेट अदालत ने व्यक्ति को अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे को 3,000 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल पाहुजा ने पिछले सप्ताह अपने एक आदेश में कहा, ‘‘अंतरिम भरण-पोषण के प्रावधान का आशय (यह) है कि (यह) अदालत को ऐसे अंतरिम आदेश पारित करने का अधिकार देता है, जो वह उचित और ठीक समझे। घरेलू हिंसा के कारण पीड़ित व्यक्ति को वित्तीय संकट से बचाने और उसके भरण-पोषण के लिए मौद्रिक राहत प्रदान की जाती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अपीलकर्ता पति है जिसका कर्तव्य अपनी पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण करने का है, इसलिए उसकी आय को उसके और उसकी पत्नी तथा नाबालिग बच्चे के बीच विभाजित किया जाना चाहिए जो इस मामले में उपयुक्त है।’’
सत्र अदालत भी मजिस्ट्रेट के इस निष्कर्ष से सहमत थी कि पति प्रति माह 12,500 रुपये से अधिक कमा रहा था।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)










QuickLY