कोलकाता, 21 जून कुछ प्रमुख संपादकों और लेखकों के अनुसार, 1975 में आपातकाल की घोषणा होने पर देश में वाक् स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई थी और अब, आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाये जाते समय व्यक्तिगत पसंद पर एक बार फिर हमला किया जा रहा।
मंगलवार को यहां संपन्न हुए पत्रकार एवं साहित्यकार गौर किशोर घोष के जन्म शताब्दी समारोह के दौरान एक परिचर्चा में ‘देशप्रेम और देशद्रोह’ विषय पर ये विचार व्यक्त किये गये।
शिलॉंग टाइम्स की संपादक पेट्रीसिया मुखिम ने कहा, ‘‘यहां एक बहादुर व्यक्ति (घोष) थे, जिन्होंने लोकतंत्र खत्म होने के प्रतीक के तौर पर अपना सिर मुंडवा लिया और उस सिद्धांत के लिए जेल गये, जिसमें वह यकीन रखते थे...उन्होंने इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखने का साहस किया और उन्हें एक फासीवादी कहा।’’
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में देश में आपातकाल घोषित किये जाने के बाद, मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता घोष को गिरफ्तार कर लिया गया था।
मुखिम ने कहा, ‘‘जब भारत की आजादी के 28 साल हुए थे, तब (देश में) लोकतंत्र खतरे में था। आज भारत की आजादी को 75 साल हो गये हैं, और हम नहीं कह सकते हैं कि हम खुशहाल हैं। हम नहीं कह सकते कि आज हमारे पास एक बेहतर लोकतांत्रिक प्रणाली है।’’
परिचर्चा में भाग लेते हुए आनंद बाजार पत्रिका की ‘एसोसिएट एडिटर’ सेमंती घोष ने कहा कि भारत में आमतौर पर लोग अलग-थलग रहने के बजाय एक समुदाय में रहना पसंद करते हैं और यह सामुदायिक पहचान उसकी व्यक्तिगत पहचान को बेहतर बनाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘और यह सामुदायिक पहचान शीघ्रता से एक सीमा तय करती है, और इससे परे हर चीज तथा हर किसी को बाहरी के तौर पर देखती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘आज सत्तारूढ़ वर्ग को शासित वर्ग के एक हिस्से का सहयोग प्राप्त है, जो व्यक्तिगत पसंद की सीमा रेखा खुशी-खुशी लांघ चुका है...।’’
सेमंती ने कहा, ‘‘आजाद भारत के 75 वर्षों में, हमने कभी इस तरह का बंधन नहीं देखा। व्यक्ति को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की जरूरत पड़ रही।’’
उन्होंने कहा, ‘‘देश में जो भी प्रणाली मौजूद है वह लोकतंत्रिक नहीं है, बल्कि बहुसंख्यकवाद है। यह बाहर से नहीं आयी, बल्कि उनसे आयी है जो खुद को लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला बताते हैं। इसे लोकतंत्र का विरोधाभास कहा जा सकता है।’’
मुखिम ने कहा कि जब अन्य दलों ने आपातकाल लगाये जाने पर कांग्रेस से सवाल करना शुरू कर दिया, तब गौर किशोर घोष ने कहा था कि नेताओं को कांग्रेस से उसके सिद्धांतों के बारे में सवाल करना चाहिए, और इसलिए नहीं कि वे वैकल्पिक शासक बनना चाहते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘(गौर किशोर) घोष की लेखनी से हमने यह सबक सीखा है कि एक वैचारिक लड़ाई को क्रूरता से या केवल कानून के जरिये नहीं रोका जा सकता। बल्कि, एक बेहतर, अहिंसक, गैर विध्वंसकारी विचारधारा का सहारा लेना होगा।’’
कार्यक्रम का संचालन करने वाली सेवानिवृत्त नौकरशाह एवं लेखिका अनीता अग्निहोत्री ने देशभक्ति के बारे में गौर किशोर की लेखनी को याद दिलाते हुए कहा, ‘‘...अधिकारों पर अधिक जोर देने वाली देशभक्ति फर्जी है। मानवता पर बल देने वाली देशभक्ति सच्ची है।’’
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