देश की खबरें | न्यायालय ने डीयू के पूर्व प्रोफेसर साईबाबा को बरी करने संबंधी बंबई उच्च न्यायालय का आदेश किया रद्द

नयी दिल्ली, 19 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने माओवादियों से संबंध के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा को बरी करने संबंधी बंबई उच्च न्यायालय के आदेश को बुधवार को रद्द कर दिया।

शीर्ष अदालत ने बंबई उच्च न्यायालय को चार महीने के भीतर मामले पर गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश भी दिया।

न्यायमूर्ति एम.आर. शाह और न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार की पीठ ने बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को साईबाबा और अन्य आरोपियों की अपील उसी पीठ के पास नहीं भेजने का निर्देश दिया, जिसने उन्हें आरोपमुक्त किया था।

न्यायालय ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रतिबंधों को मंजूरी देने सहित कानून से संबंधित सभी प्रश्नों पर उच्च न्यायालय द्वारा विचार किए जाने का विकल्प खुला रहेगा।

पीठ ने कहा, ‘‘हमने बंबई उच्च न्यायालय द्वारा पारित किए गए फैसले और आदेश को रद्द कर दिया है। उक्त अपीलों पर उनके गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से विचार करने के लिए विषयों को वापस उच्च न्यायालय भेज दिया गया है।’’

शीर्ष अदालत ने 15 अक्टूबर को इस मामले में साईबाबा और अन्य को बरी करने संबंधी बंबई उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा कि राहत देने के दौरान उच्च न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया।

यह निर्देश उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र सरकार की अपील पर आया है।

शीर्ष अदालत में महाराष्ट्र सरकार का पक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और वकील अभिकल्प प्रताप सिंह ने रखा। वहीं साईबाबा की ओर से वकील आर. बसंत पेश हुए।

शनिवार को हुई एक विशेष सुनवाई में, शीर्ष अदालत ने साईबाबा की दिव्यांगता और स्वास्थ्य की स्थिति के कारण जेल से रिहा करने का आदेश देने के अनुरोध को खारिज कर दिया था और महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रार्थना का विरोध करने के बाद उन्हें घर में नजरबंद करते हुए कहा था कि घर में नजरबंद करने की मांग करने की आजकल “शहरी नक्सलियों” की एक नयी प्रवृत्ति सामने आई है।

साईबाबा की 2014 में गिरफ्तारी के बाद उच्च न्यायालय ने पिछले साल 14 अक्टूबर को उन्हें व अन्य को मामले में बरी कर जेल से रिहा करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा कि यूएपीए के प्रावधानों के तहत मामले में आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का आदेश ‘‘कानून की दृष्टि से गलत एवं अवैध’’ था।

अदालत ने साईबाबा के अलावा महेश करीमन तिर्की, पांडु पोरा नरोते (दोनों किसान), हेम केशवदत्त मिश्रा (छात्र), प्रशांत सांगलीकर (पत्रकार) और विजय तिर्की (मजदूर) को भी बरी कर दिया था। विजय तिर्की को 10 साल की जेल की सजा सुनायी गयी थी, जबकि शेष व्यक्तियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गयी थी।

अपील लंबित रहने के दौरान नरोते का निधन हो गया।

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