नयी दिल्ली, 22 जुलाई अगले दो दशक तक कोयला भारतीय ऊर्जा प्रणाली की रीढ़ बना रहेगा और इसके उपयोग में कमी लाना स्वच्छ ऊर्जा और बैटरी भंडारण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों के आयात पर बहुत अधिक निर्भर करेगा। सोमवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई है।
संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2023-24 के अनुसार, कोयले के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड को समाप्त करने की प्रौद्योगिकियों और अलग किए गए कार्बन के उपयोग और भंडारण की खोज की जानी चाहिए।
समीक्षा कहती है, “कोयले के उपयोग में कमी अक्षय ऊर्जा और बैटरी भंडारण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों के आयात पर बहुत अधिक निर्भर करेगी, जब तक कि देश घरेलू स्तर पर उपलब्ध खनिज संसाधनों पर आधारित प्रौद्योगिकियों के विकास में निवेश नहीं करता है और ऐसी प्रौद्योगिकियां जो महत्वपूर्ण खनिजों के पुनः उपयोग, पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण को सक्षम बनाती हैं।”
इसमें कहा गया है कि भारत में गैसीकरण प्रौद्योगिकी को अपनाने से कोयला क्षेत्र में बदलाव आ सकता है और प्राकृतिक गैस, मेथनॉल और अमोनिया के आयात पर निर्भरता कम हो सकती है तथा उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी।
कुल बिजली उत्पादन के 70 प्रतिशत में कोयले का इस्तेमाल होता है। यह विभिन्न उद्योगों जैसे इस्पात, स्पॉन्ज आयरन, सीमेंट और कागज में भी महत्वपूर्ण है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, “भारत में गैसीकरण प्रौद्योगिकी को अपनाने से कोयला क्षेत्र में क्रांति आ सकती है, जिससे प्राकृतिक गैस, मेथनॉल, अमोनिया और अन्य आवश्यक उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम होगी और उत्सर्जन में भी कमी आएगी।”
केंद्र सरकार ने कोयला गैसीकरण मिशन सहित कई स्वच्छ कोयला पहल शुरू की हैं। देश का लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले को गैस में बदलना है।
भारत की प्राथमिक वाणिज्यिक ऊर्जा में कोयले का योगदान 55 प्रतिशत से अधिक है।
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