नयी दिल्ली, 18 सितंबर कोयला घोटाला मामले में सीबीआई द्वारा गवाह बनाए गए एक व्यक्ति ने अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन का दावा करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के उस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें उसे कथित घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में आरोपी बनाया गया है।
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई को ‘‘परस्पर विरोधाभासी’’ करार दिया है।
न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने गौतम करमाकर की याचिका पर ईडी को नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता ने ईडी की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब वह अनुसूचित अपराध के लिए सीबीआई या अन्य एजेंसियों द्वारा किसी जांच का सामना नहीं कर रहा है तो ईडी उसे एक ‘प्रेडीकेट’ अपराध में आरोपी कैसे बना सकती है।
‘प्रेडीकेट’ अपराध, किसी बड़े अपराध का एक घटक है।
करमाकर ने अपनी याचिका में दलील दी है कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने की संभावना है, जिसमें कहा गया है कि अपराध के आरोपी किसी भी व्यक्ति को अपने खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
करमाकर के वकील विजय अग्रवाल ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि उनका मुवक्किल ‘‘उसी घटनाक्रम और लेनदेन की श्रृंखला’’ में सीबीआई का गवाह है, जिसके लिए उसे ईडी द्वारा आरोपी के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
उन्होंने दलील दी कि संबंधित मामलों में दोनों जांच एजेंसियों की अलग-अलग कार्रवाई ‘‘परस्पर विरोधाभासी’’ है। उन्होंने ईडी की कार्यवाही निरस्त किए जाने का आग्रह किया।
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