कोलकाता, दो जून आनंदमन किसी अन्य अनाथालय की तरह ही था जहां कुछ अनाथ बच्चों की नोक-झोंक की आवाज आती रहती थी और एक अधेड़ आदमी के उंगली थामे वे बच्चे किसी बेहतर जिंदगी के सपने बुना करते रहते थे।
जिंदगी मुश्किल थी, लेकिन कम से कम उन्हें रोज दो वक्त का भोजन, पहनने को कपड़े और पढ़ने को किताबें मिलती थी।
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फिर पश्चिम बंगाल के समुद्री तट पर राक्षसी चक्रवाती तूफान अम्फान आया और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को तहस-नहस कर दिया।
अम्फान ने आनंदमन के इस छोटे आशियाने को भी नहीं छोड़ा।
हाथों में किताबें समेटे दिलीप कुमार करण 20 अनाथ बच्चों के साथ तीन कमरों वाले अनाथालय के एक कोने में दुबक गए।
मूसलाधार बारिश और तेज हवा के कारण उनके आशियाने की छत में दरारें पड़ने लगीं। कुछ देर बाद छत का बड़ा हिस्सा गिर गया और चार से 15 साल के अनाथ बच्चों का यह आशियाना उजड़ गया। अब वे खुले आसमान के नीचे थे, जहां बारिश की बूंदें उन्हें ऐसे चुभ रही थीं जैसे कोई मधुमक्खी डंक मार रही हो।
चक्रवाती तूफान आए लगभग दो सप्ताह बीत चुके हैं और दक्षिण 24 परगना के काकद्वीप क्षेत्र के निश्चिंतपुर में अनाथालय चलाने वाले 50 वर्षीय करण मलबे में बदल चुकी छत की मरम्मत कराने और बच्चों के लिए नये बिस्तर इत्यादि खरीदने के लिए धन जमा करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के कारण आर्थिक हालत वैसे ही बुरी हो चली थी और इस चक्रवात ने हालत बदतर कर दिए। जब तूफान आया, बच्चे बुरी तरह डर गए थे। मुझे समझ ही नहीं आया कि उन्हें संभालूं या उनके सामान बचाऊं। घर के एक हिस्से की छत उड़ गई थी। इसलिए हम सब एक साथ घर के दूसरे कोने में गए। थोड़ी ही देर में कमरा भी बारिश के पानी से भर गया।
आठ साल पहले अपनी बचत के पैसों से अनाथालय खोलने के लिए मोबाइल कंपनी की नौकरी छोड़ने वाले करण ने पीटीआई- को बताया कि हमें सामान्य होने में समय लगा लेकिन अब छत की मरम्मत कराने के लिए बहुत कम पैसे बचे हैं।
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