नयी दिल्ली, एक सितम्बर दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक बार दाखिल होने के बाद पिंजरा तोड़ की एक सदस्य को पूरा आरोप पत्र उपलब्ध कराए। वह इस साल फरवरी में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित एक मामले में आरोपों का सामना कर रही है।
न्यायमूर्ति विभु बाखरू ने पुलिस को यह निर्देश भी दिया कि वह महिलाओं के समूह की सदस्य- जेएनयू छात्रा नताशा नरवाल को संरक्षित गवाहों के बयान सहित सभी बयान उपलब्ध कराये, जिन पर उसका मामला टिका हुआ है।
अदालत ने कहा कि संरक्षित गवाहों के बयानों को उपयुक्त तरीके से संपादित किया जा सकता है जिससे कि उनकी पहचान की रक्षा की जा सके। अदालत ने कहा कि इस संबंध में एक बयान पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने पूर्व में दिया था।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस ने भरोसा दिया है कि वह आरोप पत्र 17 सितम्बर या उससे पहले दाखिल करेगी।
अदालत का यह आदेश तब आया जब नरवाल के वकील ने कहा कि उनकी जमानत अर्जी उच्च न्यायालय से वापस ली जा रही है और वह याचिका आरोपपत्र दाखिल किये जाने के बाद उपयुक्त निचली अदालत में दायर की जाएगी।
अदालत ने कहा, ‘‘याचिका को वापस लिया मानकर खारिज किया जाता है।’’
उच्च न्यायालय ने 31 अगस्त को नरवाल से यह विचार करने को कहा था कि क्या वह चाहती हैं कि उनकी अर्जी पर सुनवायी दो सप्ताह बाद की जाए, जब उनके खिलाफ मामले में आरोप पत्र दाखिल किये जाने की उम्मीद है।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि संबंधित निचली अदालत के समक्ष आरोप पत्र दाखिल किये जाने के बाद जमानत अर्जी वहां पर दायर की जा सकती है।
मई में गिरफ्तार हुई नरवाल ने निचली अदालत के उसे जमानत देने से इनकार करने वाले फैसले को चुनौती दी है। वह भारतीय दंड संहिता और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत तीन मामलों में आरोपी है।
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