क्या ट्रंप के नए टैरिफ से चीन की जेब पर असर पड़ेगा?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही प्रतिबंधों के कारण पस्त है. बदहाल इकॉनमी सरकार से नाराजगी की बड़ी वजह साबित हुई है. सैंक्शन्स के बावजूद चीन, ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. क्या ट्रंप के नए टैरिफ चीन पर असर डालेंगे?अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की है. सोशल मीडिया पर यह एलान करते हुए ट्रंप ने लिखा कि टैरिफ तत्काल प्रभाव से लागू होगा.

ईरान एक तेल उत्पादक देश है और ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. इसके अलावा तुर्की, इराक, भारत और यूएई भी ईरान के प्रमुख व्यापारिक सहयोगियों में हैं.

टैरिफ की घोषणा के जवाब में चीन ने कहा कि वह अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करेगा. ट्रंप के लगाए गए टैरिफ के बाबत पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ नियंग ने कहा, "हम हमेशा से मानते आए हैं कि टैरिफ वॉर में कोई विजेता नहीं होता, और चीन दृढ़ता से अपने वैध अधिकारों और हितों की रक्षा करेगा."

चीन कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है. वह वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा ग्राहक और रूसी तेल का भी टॉप खरीदार है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच इन देशों से तेल खरीदने के कारण चीन को बड़ा आर्थिक फायदा होता रहा है. सस्ता तेल खरीदने की वजह से हालिया सालों में उसकी भारी बचत होती रही है.

ईरान से कितना तेल खरीदता है चीन?

डेटा और एनालिटिक्स फर्म 'केप्लर' के साल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि जहाज के मार्फत ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा चीन खरीदता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल के सीमित खरीदार हैं. सैंक्शन्स के बावजूद ईरान से तेल खरीदना चीन को सस्ता भी पड़ता है.

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केप्लर के मुताबिक, बीते साल चीन ने औसतन 13.80 लाख बैरल प्रति दिन (बीपीडी) ईरानी तेल खरीदा. समुद्र के रास्ते चीन ने जितना तेल आयात किया, उसकी कुल मात्रा करीब 1.02 करोड़ बीपीडी है. यानी, इस इंपोर्ट में ईरान से खरीदे गए तेल की हिस्सेदारी 13 फीसदी से ज्यादा रही.

चीन में ईरानी क्रूड के मुख्य ग्राहक कौन हैं?

ईरान से निकले कच्चे तेल का चीन में सबसे बड़ा ग्राहक है, टीपॉट्स. ये दरअसल चीन की कुछ छोटी तेल रिफाइनरियां हैं, जो अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद ईरानी तेल खरीदती रही हैं. कम कीमत पर ईरान से क्रूड खरीदकर ये उसे प्रॉसेस करती हैं. जितना सस्ता तेल, टीपॉट्स के लिए उतना मुनाफा.

कारोबारियों और विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन की बड़ी सरकारी तेल कंपनियां 2018-19 से ही ईरानी तेल खरीदना बंद कर चुकी हैं. हालांकि, चीन में रिफाइनिंग की कुल क्षमता का करीब एक चौथाई हिस्सा टीपॉट्स के पास है.

कितना सस्ता पड़ता है ईरान का तेल?

ईरान का लाइट क्रूड, आईसीई ब्रेंट से काफी सस्ता पड़ता है. आईसीई ब्रेंट, कच्चे तेल की कीमतों का एक ग्लोबल बेंचमार्क है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कारोबारियों के हवाले से बताया कि दिसंबर से, ईरानी लाइट क्रूड आईसीई ब्रेंट की तुलना में करीब 8 से 10 डॉलर बैरल कम पर चीन को डिलिवर होता रहा है.

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तुलना के लिए, ओमान के तेल पर पश्चिमी देशों का आर्थिक प्रतिबंध नहीं है. चीनी रिफाइनर ओमान क्रूड ना खरीदकर ईरान से लाइट क्रूड खरीदें, तो इसक मतलब है प्रति बैरल 8 से 10 डॉलर तक की बचत.

क्या अमेरिकी प्रतिबंधों का असर होगा?

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हतोत्साहित करने के लिए अमेरिका ने 2018 में तेहरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगाए. जनवरी 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से अब तक राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के तेल कारोबार पर कई और प्रतिबंध लगा चुके हैं.

चीन, ईरान का अहम सहयोगी है. वह ईरान के साथ व्यापार को वैध बताता है और प्रतिबंधों को सही नहीं मानता है. हालांकि, चीन के सीमा शुल्क के आंकड़ों में जुलाई 2022 से समुद्र के रास्ते ईरान से आए तेल का कोई रिकॉर्ड नहीं है. मगर, टीपॉट्स के माध्यम से ईरानी तेल का बड़ा हिस्सा चीन जरूर पहुंच रहा है.

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दिसंबर 2025 में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टीपॉट्स कंपनियां 'बॉन्डेड स्टोरेज टैंक्स' के मार्फत ईरानी क्रूड खरीद रही हैं. ऐसे टैंक्स या वेअरहाउस, आयातकों को तत्काल कोई टैक्स या ड्यूटी चुकाए बिना इंपोर्ट किए गए सामान को सुरक्षित तरीके से जमा रखने का जरिया देते हैं. रॉयटर्स ने कारोबारी सूत्रों के हवाले से बताया कि यहां भंडार करके रखे गए कच्चे तेल को प्रॉसेसिंग प्लांट तक पहुंचाने में कुछ ही दिन लगते हैं और यह विकल्प सस्ता भी पड़ता है.