लगातार क्यों बढ़ रही है चांदी की कीमत
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

चांदी की कीमत लगातार बढ़ती ही जा रही है. अब यह सवाल उठ रहा है कि चांदी वैश्विक स्तर पर फिर से इतनी अहम क्यों होती जा रही है.चांदी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर चांदी ने दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 के बीच करीब 144 फीसदी का रिटर्न दिया, जिसकी कीमत 85,146 रूपये से बढ़कर 2,08,062 रूपये प्रति किलो हो गई.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में 2025 की शुरुआत में इसकी कीमत लगभग 30 डॉलर प्रति औंस थी, जो आज दोगुनी से ज्यादा हो गई. 24 दिसंबर को यह 69 डॉलर प्रति औंस का आंकड़ा पार कर अब तक के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई.

जनवरी में न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज के कमोडिटी डिवीजन ‘कॉमेक्स' (COMEX) ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर चांदी की कीमत लगभग 30 डॉलर के आसपास थी. गर्मियों में यह 37 डॉलर और 40 डॉलर के आसपास रही, लेकिन सितंबर में इसमें तेजी से उछाल आया. इसके बाद तेजी और बढ़ी. साल के आखिरी तीन महीनों में चांदी की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई.

यानी, इस साल की शुरुआत से अब तक चांदी की कीमत में 110 फीसदी से भी ज्यादा का उछाल आया है, जो इस कीमती धातु के लिए एक बड़ा बदलाव है. चांदी को हमेशा से सोने के मुकाबले कमतर आंका जाता रहा है, खासकर तेजी के बाजार में (बुल मार्केट), जब सोने की कीमत अक्सर चांदी की तुलना में तेजी से बढ़ती है.

अगले साल कैसी रहेगी चांदी

कुछ निवेशक चेतावनी दे रहे हैं कि चांदी की कीमतों में थोड़े समय के लिए गिरावट आ सकती है, लेकिन बड़े निवेशकों की भावनाएं अगले साल के लिए भी चांदी के पक्ष में हैं, यानी उन्हें उम्मीद है कि इसकी कीमत बढ़ेगी.

वर्ष 2025 से पहले, पिछले 10 वर्षों में चांदी की कीमत अधिकांश समय 15 से 25 डॉलर के बीच रही. हालांकि, जब भी निवेशकों में उत्साह आता था, तो यह 30 डॉलर के पार चली जाती थी, लेकिन यह उस तेजी को आगे बढ़ाने में हमेशा नाकाम रही.

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यहां तक कि 1980 और 2011 में जब कीमतें काफी ज्यादा थीं, तब भी चांदी 49 डॉलर प्रति औंस के आसपास ही अधिकतम पहुंची थी. इसकी तुलना में, सोना उसी समय 1,900 डॉलर के स्तर को भी पार कर गया था. इससे पता चलता है कि सोने के मुकाबले चांदी की तेजी हमेशा कम रही.

हालांकि, इस साल सोने का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रहा है. जहां चांदी की कीमत दोगुनी से ज्यादा बढ़ गई है, वहीं सोने की कीमत सिर्फ 60 फीसदी के करीब बढ़ी है और यह 4,340 डॉलर प्रति औंस के आसपास है.

क्यों आई चांदी के दामों में तेजी

चांदी की कीमतों में यह तेजी इसलिए आई, क्योंकि अमेरिकी डॉलर कमजोर हो रहा था और उम्मीद थी कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) ब्याज दरों में कटौती करेगा. इन दोनों कारणों से, कीमती धातुएं निवेशकों के लिए संकट के समय में सुरक्षित निवेश का जरिया बन गईं.

चांदी की कीमतों में इस जबरदस्त तेजी के पीछे कुछ और भी बड़े कारण थे. इनमें से मुख्य है दुनिया भर में चांदी की सप्लाई कम होना, क्योंकि चांदी का उत्पादन, उसकी बढ़ती मांग के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रहा है.

दुनिया को आपूर्ति की जाने वाली आधी से ज्यादा चांदी का उत्पादन लैटिन अमेरिका में होता है. लेकिन अब यहां उत्पादन लगातार गिर रहा है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि खदानें पुरानी हो रही हैं और भंडार कम होते जा रहे हैं. दुनिया की 25 फीसदी चांदी की आपूर्ति मेक्सिको से होती है. यहां भी हाल के वर्षों में उत्पादन में दोहरे अंकों की गिरावट देखी गई है.

मेक्सिको के उत्तरी चिहुआहुआ राज्य में मौजूद सैन जूलियन खदान देश की सबसे बड़े खदानों में गिनी जाती है, जो 2027 तक बंद होने वाली है. यह खदान संचालक कंपनी ‘फ्रेस्निलो' के सबसे बड़े प्रोजेक्ट में से एक है. इसकी अयस्क की गुणवत्ता गिर रही है और इसके भंडार अब लगभग खत्म होते जा रहे हैं.

वहीं, दुनिया को एक तिहाई चांदी की आपूर्ति करने वाले देश पेरू, बोलीविया और चिली अयस्क की घटती गुणवत्ता से जूझ रहे हैं. इससे खनन महंगा और कम मुनाफे वाला हो गया है. ये देश राजनीतिक अस्थिरता और सख्त खनन नियमों का भी सामना कर रहे हैं. इससे उनके खनन क्षेत्रों में नए निवेश को बढ़ावा नहीं मिल रहा है.

लंदन स्थित ‘ग्लोबलडेटा' के विश्लेषकों का मानना है कि चांदी की नई खदानें न मिलने या सरकार की तरफ से सहायक नियम न बनने की स्थिति में, इस दशक के समाप्त होते-होते लैटिन अमेरिका का उत्पादन या तो थम जाएगा या उसमें गिरावट आ जाएगी.

उद्योग संघ ‘द सिल्वर इंस्टीट्यूट' ने पिछले महीने जानकारी दी थी कि चांदी का बाजार लगातार पांच साल से संरचनात्मक घाटे की स्थिति में है. इसका मतलब है कि बाजार में उत्पादन और रीसाइक्लिंग से जितनी चांदी आ रही है, उसकी तुलना में उसकी खपत लगातार ज्यादा हो रही है.

इंस्टीट्यूट ने कहा कि इस साल की मांग, आपूर्ति से लगभग 95 मिलियन औंस ज्यादा रहने का अनुमान है.

चांदी की मांग क्यों बढ़ रही है

चांदी की मांग सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ रही है कि निवेशक इसे सुरक्षित निवेश मानते हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह आधुनिक तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा (जैसे, सोलर पैनल) के उत्पादन के लिए भी बहुत जरूरी हो गया है.

चांदी में कुछ विशेष गुण होते हैं, जैसे कि बिजली और गर्मी के संचालन की इसकी क्षमता काफी अच्छी होती है. इन गुणों के कारण ही, चांदी दुनिया भर के उन उद्योगों के लिए बहुत जरूरी हो गई है जो तेजी से बढ़ रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, सोलर पैनल में विद्युत संचालन के लिए चांदी के पेस्ट का इस्तेमाल जरूरी होता है. चूंकि दुनिया भर की सरकारें अक्षय ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल करने पर जोर दे रही हैं. इसलिए, सौर ऊर्जा उद्योग में चांदी की मांग बहुत तेजी से बढ़ने की संभावना है.

इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को भी सामान्य ईंधन वाली कारों की तुलना में दो-तिहाई अधिक चांदी की आवश्यकता होती है. चांदी का इस्तेमाल ईवी की बैटरियों, तारों (वायरिंग) और चार्जिंग स्टेशन जैसी बुनियादी सुविधाओं में होता है. इससे यह धातु पर्यावरण-अनुकूल यातायात के भविष्य के लिए एक जरूरी हिस्सा बन गया है.

चांदी डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तेजी से जरूरी होती जा रही है. एआई चिप्स के लिए भी चांदी की जरूरत होती है. साथ ही, बड़े डेटा सेंटर अपने सर्किट को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए चांदी का उपयोग करते हैं, क्योंकि इन जगहों पर तेज गति और विश्वसनीयता सबसे अहम होती है.

यह कीमती धातु भारी मात्रा में बिजली का प्रवाह संभाल सकती है. इससे बड़े पैमाने पर भी डेटा सिग्नल साफ रहते हैं और सिस्टम का प्रदर्शन स्थिर बना रहता है. इसके अतिरिक्त, इसकी बेहतर गर्मी सोखने और बाहर निकालने की क्षमता (थर्मल कनडक्टिविटी) एआई के काम से निकलने वाली अत्यधिक गर्मी को नियंत्रित करने में सहायक होती है.

चांदी का इस्तेमाल अब सिक्कों और ईंटों (बार) में भले ही कम हो रहा हो, लेकिन दूसरे पुराने और नए क्षेत्रों में इसकी मांग बनी हुई है. यह गहनों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, मेडिकल डिवाइसों और आम उपभोक्ता वस्तुओं में भी काफी इस्तेमाल की जा रही है.

‘द सिल्वर इंस्टीट्यूट' का अनुमान है कि आने वाले पांच वर्षों में, वैश्विक स्तर पर उद्योगों में चांदी की मांग लगातार बढ़ती रहेगी.

ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने इस महीने आकलन किया है कि अब से 2031 के बीच ऑटो सेक्टर में चांदी की मांग सालाना 3.4 फीसदी बढ़ेगी. इसके साथ ही, अगले कुछ वर्षों में अमेरिका में डेटा सेंटर के निर्माण में 65 फीसदी की जो भारी बढ़ोतरी होने का अनुमान है, उसका सीधा फायदा भी चांदी को मिलेगा.

चांदी का ऐतिहासिक महत्व

हजारों वर्षों से चांदी को मुद्रा और संपत्ति जमा करने के साधन के तौर पर माना गया है. प्राचीन सभ्यताओं में लोग इसका उपयोग व्यापार के लिए करते थे, क्योंकि यह दुर्लभ, टिकाऊ और बांटने में आसान थी. चांदी की अहमियत तब और बढ़ गई, जब यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने लैटिन अमेरिका में इसके बड़े भंडार खोजे. इससे यह रोजाना के लेन-देन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली धातु बन गई.

स्पेन के "पीसेज ऑफ एट” यानी आठ रियाल के बराबर के चांदी के सिक्के दुनिया की पहली वैश्विक व्यापार मुद्रा बने. यह पेसेटा और यूरो से पहले स्पेन की पुरानी मुद्रा थी. ये सिक्के अमेरिका से लेकर एशिया और यूरोप तक हर जगह चलन में थे.

19वीं सदी में, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम सहित कई देशों ने अपनी मुद्राओं को सोने और चांदी दोनों से जोड़ दिया था. दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग का नाम ही एक पाउंड चांदी के वजन पर रखा गया था.

20वीं सदी में, जब देशों ने चांदी के मानक को हटा दिया, तो मुद्रा के रूप में चांदी का इस्तेमाल बंद हो गया. सोना केंद्रीय बैंक के भंडार में बना रहा, वहीं चांदी का उपयोग मुख्य रूप से उद्योगों में होने लगा.

चूंकि चांदी का इस्तेमाल सदियों से रोजमर्रा की मुद्रा के रूप में होता आ रहा है, इसलिए आज भी यह अपनी उस पहचान को बनाए हुए है कि यह महंगाई और वित्तीय बाजार में आने वाली अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करती है.