क्या सोचती हैं कैजुअल सेक्स से उब चुकी महिलाएं
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

तथाकथित 'हुकअप कल्चर' ने महिलाओं को आजादी और खुद से फैसले लेने का अधिकार देने का भरोसा दिलाया था. हालांकि, शोध और असल जिंदगी के अनुभव इसके कुछ और ही असर दिखा रहे हैं.विशेषज्ञों की मानें तो 'कैजुअल सेक्स' के नाम पर अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी जरूरतों या भावनात्मक सीमाओं को नजरअंदाज करता है, तो यह भावनात्मक तौर पर नुकसानदेह हो सकता है. हुकअप कल्चर से महिलाओं को आसानी से संबंध बनाने की आजादी तो मिली है, लेकिन इससे वे हमेशा खुद को मजबूत या सशक्त महसूस नहीं करती हैं. कुछ महिलाएं इसकी वजह से अप्रत्याशित रूप से भावनात्मक तौर पर खाली महसूस करने लगती हैं.

डीडब्ल्यू ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में रहने वाली कई महिलाओं से बात की. इन महिलाओं ने बताया कि हुकअप से उन्हें थोड़े समय के लिए तो आत्मविश्वास मिला, लेकिन साथ ही इसने किसी व्यक्ति के साथ गहरे रिश्ते बनाना और नजदीकी हासिल करना कठिन बना दिया.

अमेरिका की 40 वर्षीय महिला हीथर बताती हैं कि इस तनाव के कारण वह खुद को "अंदर से खाली, दुखी और थोड़े समय के लिए सशक्त महसूस करती थी, लेकिन हमेशा और पाने की चाहत बनी रहती थी.” कैजुअल सेक्स के दौरान, वह लगातार अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश करती थीं. उन्हें ऐसा लगता था जैसे वह खुद के एक हिस्से को अलग कर रही हों.

हुकअप कल्चर के नकारात्मक पहलुओं के बारे में कही गई उनकी ये बातें उस स्थिति से मिलती है जिसे पोस्टकोइटल डिस्फोरिया (पीसीडी) कहते हैं. हालांकि, इस स्थिति को लेकर कम शोध हुआ है. पीसीडी में, लोग यौन संबंध के बाद आंसू आना, दुखी होना या चिड़चिड़ापन जैसी नकारात्मक भावनाएं अनुभव करते हैं.

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2020 के एक अध्ययन में, महिलाओं ने बताया कि उन्हें सहमति से सेक्सुअल एक्टिविटी या मास्टरबेशन के बाद ये लक्षण महसूस हुए. बाद के कुछ घंटों या दिनों में वे थका हुआ या भावनात्मक रूप से परेशान महसूस करती थीं. कुछ ने कहा कि ये एहसास सिर्फ ऑर्गेज्म के बाद हुआ.

पुरुषों में भी पीसीडी के मामले सामने आते हैं. हालांकि, महिलाओं की यौन आजादी और निजी अपेक्षाओं को लेकर सदियों से चले आ रहे सामाजिक कलंक के कारण कुछ शोध सर्वे में यह बात सामने आयी है कि कैजुअल सेक्स के अनुभवों के बाद लगभग हर चार में से तीन महिलाएं इस स्थिति का सामना करती हैं.

मिले-जुले नतीजे

तीस वर्षीय फ्रेंच-इंडियन महिला इश्ता ने कहा, "मुझे लगता है कि मैं हुकअप कल्चर के लिए नहीं बनी हूं. हुकअप कल्चर मेरे स्वभाव के विपरीत है. मुझे शारीरिक संबंध से कहीं ज्यादा भावनात्मक जुड़ाव चाहिए. मैं अक्सर यह उम्मीद करती थी कि मेरे पार्टनर के मन में मेरे लिए फीलिंग्स आएगी या हम डेटिंग शुरू कर देंगे.”

सेक्स की इच्छा एक मुश्किल चीज है. कुछ शोध बताते हैं कि महिलाओं की सेक्स की इच्छा अक्सर भावनात्मक नजदीकी और रिश्तों से जुड़े संकेतों से प्रभावित होती है. इसी वजह से, शारीरिक संबंध बनाते समय भावनाओं से खुद को अलग कर पाना मुश्किल हो जाता है.

अमेरिका में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में सेक्सुअल और रिलेशनल कम्युनिकेशन की प्रोफेसर तारा सुविनयट्टिचैपोर्न का कहना है कि ऐसा अक्सर इस वजह से होता है कि महिलाओं की परवरिश कैसे होती है.

उन्होंने कहा, "महिलाओं को छोटी उम्र से ही देखभाल करने वाली, प्यार करने वाली और दूसरों का ख्याल रखने वाली बनने के लिए सामाजिक तौर पर तैयार किया जाता है. ये गुण अलग-थलग और बिना किसी भावना वाली महिला होने के बिल्कुल विपरीत हैं. यही कारण है कि महिलाओं के लिए भावनात्मक अलगाव दिखाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है.”

पीसीडी के लक्षण तब दिखाई दे सकते हैं जब जुड़ाव या नजदीकी की इच्छा पूरी न हो. किसी व्यक्ति का आत्म-सम्मान भी इस समस्या को और बढ़ा सकता है. हालांकि, यह पूरी तरह निश्चित नहीं है, लेकिन ज्यादा आत्म-सम्मान वाले जो लोग कैजुअल सेक्स करते हैं, वे अक्सर नकारात्मक भावनात्मक असर से बच सकते हैं.

तारा बताती हैं, "लेकिन बहुत से पुरुष और महिलाएं दूसरों से सराहना पाने के उद्देश्य से ऐसा करते हैं.” इससे आगे चलकर लंबी अवधि के रिश्तों को लेकर तनाव पैदा हो सकता है, खासकर अगर कोई अच्छा रिश्ता न मिल पाए.

इश्ता ने कहा, "मैं पहले बहुत ज्यादा रोमांटिक थी. अब मुझे लगता है कि मैं उन पुरुषों के सामने एक भूमिका निभाती हूं जिनके साथ मैं हुकअप करना चाहती हूं. मुझे लगता है कि मैं अब लोगों पर उतना भरोसा नहीं करती.”

हीथर ने महसूस किया कि उनका आत्म-सम्मान कम हो गया था और अपने होने वाले सेक्सुअल पार्टनर के प्रति उनका नजरिया नकारात्मक हो गया था. उन्हें "लगता था कि मर्द भरोसे के लायक नहीं होते. वे सिर्फ सेक्स में दिलचस्पी रखते हैं और वे अहंकारी होते हैं.” हीथर ने कहा, "इसके बाद अक्सर मुझे लगता था कि मेरी अहमियत कम हो गई है, जैसे किसी ने बस मुझे इस्तेमाल कर लिया हो.”

सचेत रहना मायने रखता है

उत्तरी अमेरिकी जोड़ों पर हुए हालिया अध्ययन से पता चला है कि जो कपल अधिक सजग थे, यानी जिन्होंने बिना किसी पूर्व-धारणा के सेक्स के दौरान अपनी भावनाओं और संवेदनाओं पर ध्यान दिया, उन्होंने बेहतर तरीके से सेक्स किया. तारा ने बताया कि ज्यादातर कैजुअल रिश्तों में यह जागरूकता नहीं होती. स्वभाव से ही, कैजुअल सेक्स अक्सर उस सजग जुड़ाव को छोड़ देता है जो अनुभव को भावनात्मक रूप से स्थिर बनाता है. उन्होंने यह भी कहा कि इसके ठीक विपरीत, हुकअप की वजह से महिलाओं और पुरुषों दोनों की ‘भावनाएं सुन्न हो सकती हैं'.

हीथर कहती हैं, "मैंने पॉलीएमरी (एक से अधिक लोगों से प्रेम संबंध) का पूरा अनुभव लिया और खुद की सभी सीमाएं तोड़ दीं. नतीजा यह हुआ कि मैं अंदर से थक गई और अस्थिर महसूस करने लगी. मेरी मानसिक और भावनात्मक स्थिति उसे संभाल नहीं पाई.” हीथर को अब शारीरिक संबंध से मिलने वाली क्षणिक संतुष्टि के बजाय लगातार भावनात्मक नजदीकी चाहिए. उन्हें यह समझ ईमानदारी से आत्म-मंथन करने के बाद आई. यह आत्म-मंथन ऐसी प्रक्रिया है जो महिलाओं को कैजुअल सेक्स के ऐसे अनुभवों को समझने में सहायता कर सकती है, जो अक्सर भावनात्मक रूप से थकावट या आत्म-सम्मान में कमी लाते हैं.

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भावनात्मक थकावट से जूझ रहे लोगों को तारा यह सुझाव देती हैं कि वे कुछ समय तक कैजुअल सेक्स से दूर रहें. यह दूरी उन्हें बिना किसी बाहरी दबाव के आत्म-चिंतन करने का अवसर देगी कि वे वास्तव में क्या महसूस करते हैं. उन्हें किस चीज की जरूरत है. उन्होंने कहा, "आपको बस इतना चाहिए होता है कि आप कुछ समय तक अकेले रहें. इस दौरान खुद पर ध्यान दें.”

थेरेपी या कोचिंग ऐसे अनुभवों के बाद आपके आत्मसम्मान को फिर से मजबूत करने में मदद कर सकती है. यह आपके रिश्तों के पैटर्न को समझने में भी मदद करती है, यानी आप खुद को और दूसरों को कैसे देखते और उनसे कैसे जुड़ते हैं.

रिश्तों का यह पैटर्न बचपन से बनना शुरू होता है. माता–पिता से रिश्ते, शुरुआती अनुभव, सुरक्षा या असुरक्षा की भावना, ये सब मिलकर तय करते हैं कि हम बड़े होकर लोगों से कैसे पेश आते हैं. मेडिटेशन भी आत्म-सम्मान और भावनात्मक मजबूती को बढ़ाने में मदद करता है. तारा के मुताबिक, मेडिटेशन आत्मविश्वास को दोबारा बनाने में मदद करता है. साथ ही, माइंडफुलनेस यानी सजगता से जुड़े अभ्यास भी इसी तरह के फायदे देते हैं. इसकी पुष्टि शोध में भी की गई है.

जर्नलिंग, यानी रोज डायरी लिखना और सकारात्मक बातों को दोहराना भी अन्य उपाय हैं. तारा ने कहा, "खुद से अच्छी बातें करना बहुत असरदार होता है. यह आपके अपने बारे में और आपके आस-पास की दुनिया को देखने का नजरिया बदल सकता है.” ये तरीके महिलाओं को अपना आत्मविश्वास वापस पाने, थकान से बचने और अपने यौन अनुभवों के बारे में सोच-समझकर फैसले लेने में मदद कर सकते हैं.