एक स्टडी के दौरान धुंध भरी सुबह दिल्ली में जमीन की सतह से लगभग 100 मीटर ऊंचाई पर पीएम 2.5 का स्तर काफी ज्यादा पाया गया है. यानी, मुमकिन है कि ऊंची इमारतों में रहने वाले लोग शायद ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हों.एनपीजे क्लीन एयर जर्नल में छपी एक स्टडी 'ड्रोन मेजरमेंट रिवील हाई नियर- सर्फेस अर्बन हेज' के अनुसार, दिल्ली में धुंध भरी सुबह के दौरान जमीन की सतह से लगभग 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम 2.5 का स्तर 60 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है. यानी. अगर आप दिल्ली की ऊंची इमारतों में रह रहे हैं, तो संभव है कि आप ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हों.
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पारंपरिक ग्राउंड मॉनिटरिंग सिस्टम जमीन से चार या पांच मीटर ऊपर तक ही प्रदूषण का पता लगाने में सक्षम है. इसके कारण ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद हवा में प्रदूषण के स्तर की जानकारी नहीं मिल पाती है. शोधकर्ताओं का दावा है कि हवा में प्रदूषण सिर्फ जमीन पर ही नहीं होता, बल्कि ऊपर की परतों में भी फैला हुआ है.
दिल्ली और आसपास के एनसीआर क्षेत्र में मॉनसून के बाद और सर्दियों के दौरान अक्सर धुंध दिखाई देती है. इसमें बहुत अधिक मात्रा में सूक्ष्म कण, खासकर पीएम 2.5 मौजूद होते हैं. ये कण हवा को धुंधला बनाते हैं. साथ ही जलवायु, वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा होता है.
हवा की गुणवत्ता का अनुमान लगाने के लिए ज्यादातर रिसर्च सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा और जमीन पर मापे गए पीएम 2.5 के स्तर पर आधारित होती हैं. ऐसे में इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने ऊंचाई के हिसाब से हवा में प्रदूषण के स्तर को मापा है. इसे 'वर्टिकल प्रोफाइलिंग' भी कहते हैं.
स्टडी के मुताबिक, इस डेटा से एयर क्वालिटी मॉडल जैसे कि डब्ल्यूआरएफ-केम को बेहतर बनाया जा सकता है. इससे प्रदूषण की भविष्यवाणी ज्यादा सटीक हो सकेगी. फिलहाल धुंध के दौरान डब्ल्यूआरएफ-केम मॉडल जमीन से लगभग 100 मीटर ऊंचाई पर हवा की परत में नमी को 30 प्रतिशत और पीएम 2.5 के स्तर को लगभग 50 प्रतिशत कम आंकता है.
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पारंपरिक ग्राउंड मॉनिटरिंग सिस्टम भारी और विशाल आकार के होते हैं. इन्हें संचालित करने के लिए काफी मानव संसाधन की जरूरत पड़ती है. ऐसे में, संबंधित स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने कम लागत वाले पार्टिकुलेट मैटर सेंसर से लैस एक खास ड्रोन का इस्तेमाल किया है.
अजीत अहलावत, डेल्फ्ट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी नीदरलैंड्स में असिस्टेंट प्रोफेसर और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने बताया, "ऊंचाई पर प्रदूषण के स्तर का अध्ययन करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसका पर्याप्त डेटा मौजूद नहीं है. इस स्टडी का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग ऊंचाइयों पर प्रदूषण के स्तर को जमीन की तुलना में देखना है. पार्टिकुलेट मैटर सेंसर ड्रोन की मदद से लगभग 20 से 30 मंजिला इमारतों के आसपास हवा में मौजूद प्रदूषण के आंकड़े दर्ज किए जा सकते हैं."
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सेंसर की मदद से जुटाए गए डेटा और उसकी विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन के डिजाइन में कई तरह के बदलाव भी किए गए. उदाहरण के तौर पर, शोधकर्ताओं ने विशेष एरोसोल इंलेट और ड्रायर डिजाइन किया, जिन्हें अजीत अहलावत ने जर्मनी में काम करते समय तैयार किया.
शोधकर्ताओं ने वर्तमान में पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों को मापने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे बीटा अटेंयुएशन मॉनिटर (ई-बाम) को आईआईटी दिल्ली की दूसरी मंजिल जितनी ऊंचाई पर रखा. ड्रोन से प्राप्त और ई-बाम की रीडिंग लगभग बराबर थी.
ऊंचाई पर कैसे बढ़ता है प्रदूषण?
शोधकर्ताओं ने ड्रोन की मदद से मार्च 2021 में दक्षिण दिल्ली में ऊंचाई पर प्रदूषण की मात्रा का डेटा एकत्रित किया. धुंध भरी सुबह में जमीन से लगभग 100 मीटर ऊपर पीएम 2.5 का स्तर करीब 160 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया. जबकि, उसी समय जमीन पर यह लगभग 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था.
यह अंतर दर्शाता है कि शहरी क्षेत्रों में ऊंची इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर रहने या काम करने वाले लोग, खासकर धुंध के दौरान, जमीन के मुकाबले कई ज्यादा मात्रा में पीएम 2.5 के संपर्क में आते हैं.
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सेंटर फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी और पॉलिसी (सीस्टेप) में रिसर्च साइंटिस्ट डॉ. पीयूष भारद्वाज बताते हैं कि जमीन से ऊपर हवा में प्रदूषण का स्तर कई मौसम संबंधी स्थितियों पर निर्भर करता है. जैसे कि ऊंचाई के साथ तापमान में बदलाव (टेम्परेचर इंवर्जन), हवा की गति, नमी और आसपास का प्रदूषण स्तर.
दिल्ली में किए गए इस अध्ययन में ड्रोन आधारित माप का उपयोग कर, एक सप्ताह तक प्रदूषण की स्थिति को मॉनिटर किया गया. मार्च 2021 की सुबहों में वैज्ञानिकों ने टेम्परेचर इंवर्जन देखा. इस दौरान जमीन के पास की ठंडी हवा ऊपर नहीं उठ पाती और प्रदूषक फंस जाते हैं, जिससे जमीन के मुकाबले लगभग 80 से 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम 2.5 का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया.
दरअसल शाम के बाद तापमान गिरने लगता है और हवा में नमी बढ़ती है. हवा की कई परतें बन जाती हैं और अक्सर टेम्परेचर इंवर्जन की स्थिति बनती है. जमीन के पास की हवा ठंडी होने लगती है और उसके ऊपर गर्म हवा की एक परत बन जाती है. यह गर्म परत नीचे की हवा को ऊपर नहीं उठने देती.
इसके कारण सूक्ष्म कण उसी परत के आसपास जमा होने लगते हैं. इसके साथ ही ट्रैफिक और ईंधन जलने से निकलने वाला ब्लैक कार्बन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भी उसी परत में जमा हो जाते हैं. अजीत समझाते हैं, "नमी की वजह से कणों का आकार बड़ा होने लगता है और हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है. सुबह के समय धुंध ज्यादा दिखती है. कुछ परिस्थितियों में इस दौरान जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर अधिक प्रदूषण मिलता है."
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डॉ. पीयूष का कहना है कि ऐसी परिस्थितियां बड़े मैदानों या बेसिन क्षेत्रों जैसे इंडो-गंगा मैदान या घाटियों में भी देखने को मिलती है. हालांकि, यह जानने के लिए और शोध की जरूरत है कि क्या दिल्ली में हर बार धुंध और ज्यादा प्रदूषण के समय ऐसा ही पैटर्न बनता है. यही बात एनसीआर और अन्य क्षेत्रों पर भी लागू होती है.
विकासशील देशों के लिए मौका
अजीत जोर देते हैं कि ड्रोन आधारित यह प्रणाली पारंपरिक जमीनी मॉनिटरिंग का विकल्प नहीं है, बल्कि इसे और मजबूत बनाने के लिए ड्रोन विकसित किया गया है. विकासशील देशों की मेगासिटी में अभी मजबूत एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग नेटवर्क मौजूद नहीं है. पारंपरिक मॉनिटरिंग स्टेशन लगाने में लगभग एक से दो करोड़ रुपये तक का खर्च आता है. वहीं, कम लागत से तैयार ड्रोन प्रणाली की लागत करीब पांच से 15 लाख रुपये के बीच है.
उन्होंने कहा कि इस तरह का ड्रोन मॉनिटरिंग सिस्टम ऐसी जानकारी जुटा सकता है, जो सैटेलाइट या पारंपरिक मॉडल से आसानी से नहीं मिलती. अजीत के अनुसार, "हमें अभी भी जमीनी मॉनिटरिंग उपकरणों की जरूरत है. यह सिर्फ एक सहायक तरीका है. देश इसे ई-बाम जैसे उपकरणों के साथ इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे प्रदूषण की स्थिति की ज्यादा वास्तविक और प्रभावी तस्वीर सामने आ सके."













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