जर्मनी में हिजाब पहनने वाली महिलाओं ने झेला ज्यादा भेदभाव
जर्मनी में रहने वाले कई लोग मानते हैं कि उन्हें रोजमर्रा में भेदभाव झेलना पड़ता है.
जर्मनी में रहने वाले कई लोग मानते हैं कि उन्हें रोजमर्रा में भेदभाव झेलना पड़ता है. एक हालिया सर्वे में सामने आया है कि हिजाब पहनने वाली महिलाओं के साथ ऐसा और भी ज्यादा होता है.जर्मनी में भेदभाव का सामना करने की चर्चा काफी लंबे समय से चली आ रही है. अब, जर्मन आर्थिक अनुसंधान संस्थान के सामाजिक‑आर्थिक पैनल (एसओपीई) के एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि लोगों को दुकान में खरीदारी करते समय, बैंक में, रेस्टोरेंट में या क्लब के गेट पर भी कई बार अलग और गलत व्यवहार का सामना करना पड़ता है. यह एक नियमित सर्वे है, जिसे जर्मन आर्थिक अनुसंधान संस्थान हर साल करता है और देश भर से करीब 30,000 लोग इस सर्वेक्षण में हिस्सा लेते हैं.
इस सर्वे में शामिल लोगों से पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले बारह महीनों में किसी तरह का भेदभाव झेलना है और अगर हां, तो कहां. इसके अलावा, उनसे यह भी पूछा गया कि उन्हें इस अलग तरह के व्यवहार का क्या कारण महसूस होता है.
सर्वे रिपोर्ट के लेखक मानते हैं कि इन नतीजों को समझते समय एक बात ध्यान में रखनी जरूरी है कि लोगों ने जिन भेदभाव के अनुभवों के बारे में बताया है, वह मई 2021 से जनवरी 2023 के दौरान हुए. उस समय जर्मनी में जीवन कोरोना महामारी से प्रभावित था.
जर्मनी के लिए गंभीर समस्या
इस सर्वे में शामिल लगभग 13.1 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्होंने पिछले 12 महीनों में भेदभाव का सामना किया है. जर्मनी में भेदभाव के खिलाफ काम करने वाली स्वतंत्र संघीय आयुक्त, फेरडा आतामान ने कहा, "देश में इतना भेदभाव होना जर्मनी के लिए एक गंभीर समस्या है.” उन्होंने आगे कहा कि एक ऐसा समाज, जिसमें लगभग 90 लाख लोग खुद को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस करते हो, वह समाज "अस्थिर और कमजोर” हो जाता है.
सर्वे में बताया गया है कि इस तरह के भेदभाव के कई नकारात्मक असर होते हैं, जैसे जीवन से असंतुष्टि, खराब सेहत, मानसिक तनाव और सरकार पर लगातार घटता भरोसा. जुलाई 2022 में आतामान को बुंडेसटाग ने पांच साल के लिए भेदभाव-रोधी आयुक्त चुना गया था.
भेदभाव की वजह
जिन लोगों ने भेदभाव को महसूस किया, उनमें से सबसे अधिक यानी 41.9 फीसदी ने बताया कि इसका मुख्य कारण उनकी जातीय पृष्ठभूमि या नस्लवादी कारण थे. हर चौथे व्यक्ति यानी 25.9 फीसदी ने कहा कि उनके अनुसार उनका रूप‑रंग इस भेदभाव का कारण था.
साथ ही, लिंग भी भेदभाव का बड़ा कारण रहा. लगभग 23.8 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्हें अपने लिंग या पहचान के कारण भेदभाव महसूस किया है. इसके अलावा, 13.9 फीसदी लोगों ने बताया कि उनकी कोई शारीरिक अक्षमता या दीर्घकालिक बीमारी भी इस भेदभाव की वजह थी.
मुस्लिम महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित
सर्वे में शामिल मुस्लिमों में से 28.6 फीसदी ने माना कि उन्होंने पिछले 12 महीनों में भेदभाव का सामना किया है, जो कि गैर-मुस्लिमों (10.4 फीसदी) की तुलना में काफी अधिक है. इस अध्ययन के अनुसार हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं में भेदभाव का प्रतिशत और भी अधिक था. सर्वे में सामने आया कि इस समूह में 38 फीसदी से भी अधिक महिलाओं ने पिछले एक साल में भेदभाव का सामना किया है.
इस सर्वे के अनुसार, भेदभाव का सामना करने वाले लोगों में से 40.7 फीसदी ने कहा कि उन्होंने रोजमर्रा की सेवाओं जैसे दुकान, बैंक, रेस्टोरेंट आदि में भेदभाव का सामना किया है. साथ ही, लगभग उतने ही लोगों यानी 39.2 फीसदी ने कहा कि उन्होंने कामकाजी जगह पर भेदभाव महसूस किया है. इसके अलावा, 41.5 फीसदी लोगों ने सड़क पर, 20.6 फीसदी लोगों ने सार्वजनिक परिवहन में और 19.5 फीसदी लोगों ने अधिकारियों, सरकारी दफ्तरों और पुलिस के साथ भेदभाव का अनुभव किया है.
भेदभाव झेलने वाले लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती है?
जर्मनी में भेदभाव का अनुभव करने वाले अधिकांश लोग यानी लगभग 56 फीसदी लोग इस बारे में कुछ नहीं करते हैं. जबकि लगभग 30 फीसदी प्रभावित लोगों ने बताया कि उन्होंने उस व्यक्ति या संस्था से सीधे बात की है. हालांकि, केवल 8.1 फीसदी लोग ही ऐसे थे, जिन्होंने भेदभाव के खिलाफ आधिकारिक शिकायत दर्ज की है.
साथ ही, हर दसवें व्यक्ति ने खुद से ही कानूनी उपायों की जानकारी खोजने की कोशिश की है. जबकि कुछ लोगों ने यानी लगभग 5.7 फीसदी लोगों ने कानूनी सलाह भी ली है. इसके बावजूद, केवल 2.6 फीसदी लोगों ने ही भेदभाव के खिलाफ वास्तविक कानूनी कदम उठाए हैं. हालांकि, इन आंकड़ों के अनुसार युवा सबसे कम कानूनी रास्ता अपनाते हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 11, 2026 12:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

