यूएन सुरक्षा परिषद की सीट नहीं मिलने से जर्मनी को झटका लगा
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की जर्मनी की कोशिशों को झटका लगा है.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की जर्मनी की कोशिशों को झटका लगा है. बुधवार को हुई वोटिंग में ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को जीत मिली.जर्मनी इससे पहले छह बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है. आखिरी बार 2019 और 2020 में. पारंपरिक तौर पर देखें तो हर आठवें साल उसने अपनी दावेदारी पेश की. हालांकि राजनयिकों के मुताबिक पहली बार यह हुआ है जब वह नाकाम हो गया. इस बार सुरक्षा परिषद के लिए सदस्यों के चुनाव में मतदान के पहले दौर में ही जर्मनी बाहर हो गया.
जर्मनी को सिर्फ 104 वोट मिले. दो तिहाई बहुमत के लिए कम से कम 127 वोटों की जरूरत होती है. पुर्तगाल को 134 और ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले. संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 सदस्य हैं हालांकि अफगानिस्तान और वेनेजुएला को फिलहाल वोट डालने का अधिकार नहीं है.
जर्मनी के लिए झटका
मतदान का ऐसा नतीजा जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स और विदेश मंत्री योहान वाडेफुल के लिए झटका माना जा रहा है जो जर्मनी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ज्यादा प्रमुख भूमिका दिलाने की कोशिशों में जुटे हैं. उन्हें सुरक्षा परिषद की सीट जीतने का भरोसा था.
वोटिंग का नतीजा आने के बाद चांसलर मैर्त्स ने कहा कि जर्मनी इस नतीजे के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में अपनी जिम्मेदारियां निभाता रहेगा. उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र के भीतर जो काम हमारे भरोसे पर दिया गया है वह इस नतीजे से नहीं बदलेगा." बर्लिन में चांसलर ने कहा, "जर्मनी इस बहुपक्षीय तंत्र का एक भरोसेमंद स्तंभ बना रहेगा. हम इस जिम्मेदारी को पूरे मन से निभाएंगे." विपक्षी पार्टियों की आलोचना के बीच उधर न्यू यॉर्क में विदेश मंत्री वाडेफुल ने कहा, "यह नतीजा सचमुच एक निराशा है, और एक कड़वी हार."
बर्लिन में लेफ्ट पार्टी की नेता इनेस श्वेर्डटनर ने कहा कि परिषद में अस्थायी सीट पाने में नाकामी से मैर्त्स की खुद को "विदेश नीति चांसलर" के रूप में स्थापित करने की कोशिशें कमजोर हुई हैं. उन्होंने जर्मन न्यूज आउटलेट टी-ऑनलाइन से कहा कि दुनिया हिलाने वाले अहम संघर्षों पर जर्मनी की चुप्पी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के स्पष्ट उल्लंघन को पहचानने में नाकामी इसकी वजह है. धुर दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी की नेता एलिस वाइडेल ने इसे मैर्त्स के लिए एक और "शर्मिंदगी" कहा है.
वोटिंग के नतीजों को लेकर आशंका की वजह से वाडेफुल पिछले हफ्ते न्यूयॉर्क भी गए ताकि संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों को आखिरी पल मना सकें हालांकि आखिर में उसका कोई फायदा नहीं हुआ.
कठिन अभियान के बाद मिली हार
जर्मनी के अभियान को शुरू से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. जर्मनी 2020 में इस दौड़ में शामिल हुआ. उसके प्रतिद्वंद्वी पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया उससे बहुत पहले इस दौड़ में शामिल हो चुके थे. गाजा के मामले में जर्मनी की स्थिति की भी काफी आलोचना हुई. इसके साथ ही ईरान पर इस्राएल के हमले और वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की पर नपी-तुली प्रतिक्रिया को लेकर भी कुछ ऐसा ही हाल रहा.
इन मुश्किलों के बावजूद वाडेफुल ने मतदान से पहले भरोसा जगाने की कोशिश की. मतदान से ठीक पहले वाडेफुल ने पत्रकारों से कहा, "हम भरोसे और सकारात्मक सोच के साथ इस चुनाव में जा रहे हैं." पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया के बारे में वाडेफुल ने कहा कि दोनों देश, "हमारे साथ उचित और रचनात्मक मुकाबले में हैं." नतीजा चाहे जो भी हो दोनों, "यूरोपीय देश और सरकारें हैं जिनके साथ हमारे वास्तव में करीबी संबंध हैं."
मैर्त्स और वाडेफुल को उम्मीद थी कि सुरक्षा परिषद की सीट जर्मनी को यूक्रेन युद्ध और गाजा के भविष्य जैसे अंतरराष्ट्रीय मसलों के हल में ज्यादा बड़ी भूमिका दिलाएगा. जर्मनी सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनना चाहता था. वाडेफुल ने बार बार यह दलील दी है कि संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद युद्ध और टकराव का राजनीतिक समाधान ढूंढने में केंद्रीय संगठन बने रहेंगे.
संयुक्त राष्ट्र का अहम संगठन
सुरक्षा परिषद में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्यों में से 15 शामिल होते हैं. परमाणु ताकत रखने वाले दूसरे विश्व युद्ध के विजेता पांच देशों के पास वीटो पावर है. ये देश हैं अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस. बाकी की दस सीटों के लिए 10 देश, दो साल के लिए चुने जाते हैं.
सुरक्षा परिषद में सीट नहीं मिलने के बाद भी इस बात के कम ही आसार हैं कि जर्मन सरकार संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं में कोई कटौती करेगी. हालांकि आलोचक इस बात की शिकायत कर सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में ढेर सारा पैसा खर्च करने के बाद भी उसके अहम पदों को भरते समय जर्मनी को पर्याप्त जगह नहीं मिली.
अमेरिका, चीन, और जापान के बाद जर्मनी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए सबसे ज्यादा पैसा देता है. शांति अभियानों और स्वैच्छिक भुगतान को इसमें शामिल किया जाए जो यह दूसरे नंबर पर है. क्षेत्रीय समूह "पश्चिमी यूरोप और अन्य" के लिए 2027-28 में खाली होने वाले दो सीटों में से एक के लिए जर्मनी उम्मीदवार था.
सुरक्षा परिषद के नए सदस्य
ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल - जिम्बाब्वे, किर्गिस्तान, त्रिनिदाद और टोबैगो, बहरीन, कोलंबिया, डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑप कॉन्गो, लातविया और लाइबेरिया के साथ सुरक्षा परिषद के 2027 में सदस्य बनेंगे. यूरोपीय संघ और नाटो के सदस्य पुर्तगाल ने अपने अभियान में सुरक्षा परिषद को ज्यादा पारदर्शी बनाने पर जोर दिया. इसके अलावा उसे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ ऐतिहासिक संबंधों का भी बड़ा फायदा मिला.
ऑस्ट्रिया नाटो का सदस्य नहीं है, शायद उसे तटस्थ देश होने का फायदा हुआ. रूस, चीन और उसके सहयोगी वियना को सुरक्षा परिषद के लिए ज्यादा स्वीकार्य सहयोगी मानते हैं. नतीजों के अपने शुरुआती आकलन में वाडेफुल ने कहा कि यूक्रेन को जर्मनी के मजबूत समर्थन ने शायद हार में भूमिका निभाई होगी. उनका कहना है कि रूस ने जर्मनी की उम्मीदवारी के खिलाफ अभियान चलाया यह बात छिपी नहीं है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 05, 2026 11:10 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

