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मेनोपॉज: जब अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं हार्मोन

जर्मनी में करीब 90 लाख कामकाजी महिलाएं मेनोपॉज की उम्र से गुजर रही हैं.

मेनोपॉज: जब अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं हार्मोन
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी में करीब 90 लाख कामकाजी महिलाएं मेनोपॉज की उम्र से गुजर रही हैं. यह बदलाव महिलाओं के शरीर और अर्थव्यवस्था, दोनों को प्रभावित कर रहा है. कंपनियां कुछ बदलाव लाकर उन्हें अपने साथ बनाए रख सकती हैं.मेनोपॉज और उनसे जुड़ी समस्याओं जैसे कि नींद न आना, ध्यान न लगा पाना, माइग्रेन और लगातार थकान महसूस होने पर आज भी महिलाएं अक्सर खुलकर बात नहीं कर पाती हैं. जर्मनी में इस समय एक करोड़ से ज्यादा महिलाएं मेनोपॉज की उम्र से गुजर रही हैं और कई हार्मोनल बदलावों से जूझ रही हैं. मगर, इस बारे में बात करना इस दौर में भी एक टैबू बना हुआ है.

मेनोपॉज की उम्र से गुजर रही महिलाओं में लगभग 90 लाख कामकाजी हैं. यानी, काम करने वाली आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा है.

मार्च 2024 में हुए 'ईफो इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च' के एक सर्वे के अनुसार, जर्मनी की लगभग एक-तिहाई कंपनियां कुशल कामगारों की कमी से जूझ रही हैं. इन परिस्थितियों में जनसंख्या में हो रहे बदलाव को देखते हुए, आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है.

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ऐसे समय में कंपनियों के लिए अपने कर्मचारियों का ध्यान रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है. बावजूद इसके मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं की समस्याएं अब तक नजरअंदाज ही होती रही हैं.

मेनोपॉज के दौरान लगभग एक-तिहाई महिलाएं ऐसे गंभीर लक्षणों से जूझती हैं, जो उनकी काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इसके लक्षण केवल हॉट फ्लैशेज (यानी बहुत गर्माहट महसूस होना) तक सीमित नहीं हैं. जोड़ों में दर्द, दिल की धड़कन बढ़ना, ध्यान न लगना, अवसाद और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं.

आमतौर पर महिलाओं में मेनोपॉज 40 के दशक के मध्य या अंत तक शुरू होता है और 10 से 15 साल तक चलता है. यह अक्सर जीवन का ऐसा दौर होता है, जब बच्चे आत्मनिर्भर हो चुके होते हैं. ऐसे समय में महिलाओं के पास अपने करियर को फिर से शुरू करने का मौका होना चाहिए, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है.

भारी आर्थिक नुकसान

'बर्लिन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड लॉ' की अंद्रेआ रुमला के अनुसार, मेनोपॉज से जुड़े लक्षणों के कारण जर्मनी की अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 9.5 अरब यूरो का नुकसान हो रहा है. इसके कारण कंपनियों को लगभग 4 करोड़ 'वर्किंग डेज' यानी कामकाजी दिनों के बराबर का नुकसान होता है.

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साल 2023 में किए एक अध्ययन में अंद्रेआ ने 28 से 67 वर्ष के आयुवर्ग की 2,000 से अधिक महिलाओं से बातचीत की. इनमें से करीब एक-चौथाई महिलाओं ने बताया कि मेनोपॉज के लक्षणों के कारण उन्हें अपने काम के घंटे कम करने पड़े. लगभग हर पांचवीं महिला ने इसके कारण नौकरी बदलने की बात कही. हर 10 में से एक महिला ने तो यह भी बताया कि मेनोपॉज के चलते उन्होंने समय से पहले रिटायरमेंट लेने का फैसला किया है, या रिटायर हो चुकी हैं.

कुछ तरह की नौकरियां ज्यादा मुश्किल

मेनोपॉज के दौरान कुछ तरह की नौकरियों करना कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाता है. जैसे, अगर ड्यूटी पर तैनात किसी महिला पुलिसकर्मी को अचानक तेज ब्लीडिंग शुरू हो जाए या ब्लैडर से जुड़ी समस्या हो, तो जरूरी नहीं कि हर बार उसके आस-पास में शौचालय उपलब्ध हो.

मेनोपॉज के लक्षण अक्सर सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को अधिक प्रभावित करते हैं. जैसे शिक्षक, चाइल्ड केयर कर्मचारी, नर्स, केयरगिवर और सेल्स में काम करने वाली महिलाएं, जो न तो घर से काम कर सकती हैं और न ही जरूरत पड़ने पर तुरंत ब्रेक ले सकती हैं.

समाज के लिए इस मुद्दे पर बात करना इसलिए भी जरूरी है कि इन नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. जैसे नर्सिंग में 85 फीसदी, स्कूलों में काम करने वालों में 73 फीसदी और व्यावसायिक कार्यालय कर्मचारियों में 65 फीसदी से अधिक महिलाएं ही हैं. ये ऐसे क्षेत्र भी हैं, जो आज के समय में सबसे अधिक कुशल कामगारों की कमी से जूझ रहे हैं.

मेनोपॉज के कारण भेदभाव का डर?

कई महिलाओं के लिए मेनोपॉज के बारे में खुलकर बात न कर पाना अपने आप में एक बड़ा बोझ है. अंद्रेआ के सर्वे में शामिल आधी से ज्यादा महिलाओं ने बताया कि उनके कार्यस्थल पर मेनोपॉज एक टैबू माना जाता है. अंद्रेआ के मुताबिक, "इस उम्र की कई महिलाएं काम पर तकलीफ झेलती हैं, लेकिन शर्म या जानकारी की कमी या कलंकित किए जाने के डर से इस बारे में बात नहीं करती हैं."

मेनोपॉज होने पर शर्म क्यों महसूस करती हैं महिलाएं

इसलिए कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे मेनोपॉज के असर और लक्षणों के बारे में लोगों को जानकारी दें. यह जानकारी सिर्फ इससे जूझ रही महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य कर्मचारियों और मैनेजर के लिए भी जरूरी है. जैसा कि अंद्रेआ बताती हैं, "इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने वाले कंपनी के डॉक्टरों और एचआर से जुड़े लोगों से मुझे अक्सर सुनने को मिलता है कि उनके बॉस इसे नजरअंदाज कर देते हैं और कहते हैं कि यह कोई जरूरी मुद्दा नहीं है."

मेनोपॉज को लेकर साधी गई चुप्पी तोड़ने के साथ-साथ महिलाओं को उनकी जरूरत के मुताबिक काम के समय और दिनचर्या में बदलाव की सुविधा मिलना भी बेहद जरूरी है. काम के घंटों में लचीलापन, जरूरत के अनुसार काम का बंटवारा और समय-समय पर ब्रेक लेने से थकान, एकाग्रता की कमी और अनिद्रा जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, इससे काम की गुणवत्ता और उत्पादकता भी बढ़ सकती है.

कामकाजी महिलाओं के करियर पर ‘पॉज’ लगाता मेनोपॉज

मसलन सेल्स में काम करने वाली महिलाओं, महिला सेल्स प्रतिनिधियों, उत्पादन क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं, महिला बस चालकों और महिला पुलिसकर्मियों के लिए यह खास तौर पर जरूरी है कि शौचालय जैसी सुविधाओं तक उन्हें जल्द और आसान पहुंच मिल सके. चूंकि अब तक मेनोपॉज को डॉक्टरों की मेडिकल पढ़ाई में बहुत कम जगह मिली है, इसलिए कंपनी के डॉक्टरों के लिए यह जरूरी है कि उन्हें इस विषय पर अतिरिक्त और उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाए.

इस मामले में ब्रिटेन सबसे आगे

पिछले कुछ सालों में इस ओर काफी बदलाव भी आए हैं, खासतौर पर ब्रिटेन इस मामले में सबसे आगे है. कार्यस्थल पर मेनोपॉज को लेकर ब्रिटिश संसद ने एक बड़ा अध्ययन शुरू किया है. इसके अलावा राज्य की स्वास्थ्य सेवा 'एनएचएस' ने नियमित स्वास्थ्य जांच में इस विषय पर परामर्श देना भी शामिल किया है.

अब तक 7,800 से ज्यादा संस्थाएं स्वैच्छिक पहल 'मेनोपॉज वर्कप्लेस प्लेज' से जुड़ चुकी हैं. इसमें वोडाफोन, बीबीसी और टेस्को जैसी कंपनियों के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन, स्कूल, चैरिटेबल संस्थाएं, स्वास्थ्य सेवा देने वाले और कई छोटी कंपनियां भी शामिल हैं.

जर्मनी में मेनोपॉज अब भी नजरअंदाज मुद्दा

वोडाफोन अपनी महिला कर्मचारियों को मेनोपॉज पर ई-लर्निंग कोर्स और काम के घंटों में लचीलापन मुहैया करा रहा है. अकाउंटिंग कंपनी 'पीडब्ल्यूसी' ने "मेनोपॉज मैटर्स" नाम की एक पहल शुरू की है, जिसके तहत मेनोपॉज से जुड़ी समस्याओं के लिए निजी इलाज का खर्च उठाया जाता है और टेलीमेडिसिन सलाह वाली हेल्थ ऐप भी दी जाती है.

वहीं जर्मनी में 2024 में 'द चेंज डॉट ओआरजी' नाम के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए एक नियोक्ता सर्वे के मुताबिक, 63 फीसदी कंपनियां अब भी मेनोपॉज को पूरी तरह या ज्यादातर निजी मामला मानती हैं. सर्वे में शामिल 74 फीसदी कंपनियों ने माना कि उनके यहां मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं को सपोर्ट देने के लिए कोई भी व्यवस्था नहीं थी. केवल सात फीसदी कंपनियां ही ऐसी थीं, जिन्होंने कहा कि वह इस मामले में "काफी" सहयोग करती हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Jan 16, 2026 12:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).