आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं जर्मनी के कई शहर और नगर पालिकाएं

जर्मनी के कई शहर और नगरपालिकाएं दिवालिया होने की कगार पर हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी के कई शहर और नगरपालिकाएं दिवालिया होने की कगार पर हैं. उनके पास इतना भी पैसा नहीं है कि वह अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियां पूरी कर सकें.श्टुटगार्ट से करीब आधे घंटे की दूरी पर दक्षिणी जर्मनी में बसा वाइसाख, कुछ समय पहले तक जर्मनी की सबसे अमीर नगर पालिका हुआ करती था. लगभग 7,700 की आबादी वाला शहर लग्जरी कार बनाने वाली कंपनी, पोर्शे का डेवलपमेंट सेंटर भी है. इसके अरबों डॉलर के मुनाफे से नगर पालिका को काफी फायदा मिलता था. जिसके वाणिज्य कर से जमा होने वाला पैसा सीधे शहर के बजट में जाता था.

साल 2009 में वाइसाख ने प्रति निवासी औसतन 20 हजार यूरो का टैक्स जमा किया था. 2011 में पोर्शे की फैक्ट्री विस्तार उद्घाटन के दौरान तत्कालीन मेयर उर्सुला क्रॉयटल ने कहा, "वाइसाख में पोर्शे की वजह से प्रति व्यक्ति टैक्स आय पूरे जर्मनी में सबसे अधिक है.”

वाइसाख में घर बनाने वाले हर परिवारों को नगर परिषद की ओर से प्रति बच्चा 10 हजार यूरो की आर्थिक मदद दी जाती थी. इस शहर में चार मंजिला लाइब्रेरी बनी, एक लाख यूरो का कॉन्सर्ट पियानो खरीदा गया और निजी संगीत कक्षाओं के लिए सब्सिडी भी दी गई. इन सबके बावजूद, मेयर उर्सुला का वादा किया था कि ज्यादातर पैसा बैंक में बचाकर रखा जाए, ताकि भविष्य में मुश्किल समय आने पर शहर के पास सुरक्षा मौजूद रहे.

अच्छे दिन खत्म

अब जर्मनी की मुश्किलें बढ़ गई है. वहां का ऑटोमोबाइल उद्योग अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है. साल 2025 में केवल पोर्शा कंपनी का मुनाफा ही करीब 96 फीसदी तक गिर गया है.

दूसरे उद्योग भी गंभीर हालत से गुजर रहे हैं. नगरपालिकाएं जिस टैक्स पर सबसे ज्यादा निर्भर थी, वह तेजी से घट गए हैं. जो शहर और कस्बे कभी बहुत समृद्ध हुआ करते थे, आज उनके खर्च तक पूरे नहीं हो पा रहे हैं.

पश्चिमी जर्मनी के राइनलैन्ड-पलाटिनेट राज्य के नीदर-ओल्म शहर के मेयर और जर्मनी की स्थानीय निकाय संघ के अध्यक्ष राल्फ श्पीगलर ने कहा, "स्थानीय प्रशासनों की आर्थिक स्थिति तेजी से खराब हो रही है.”

सामाजिक खर्च बजट पर भारी

जर्मनी में सत्ता और जिम्मेदारियां दोनों ही केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय सरकारों के बीच बंटी होती हैं. यहां स्थानीय सरकार रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े कई काम संभालती हैं यानी सत्ता की एक बड़ी जिम्मेदारी उन पर भी होती हैं. इसमें कचरा उठाने से लेकर पानी की सप्लाई, स्कूल और किंडरगार्टन, दमकल सेवा, खेल और संस्कृति और ज्यादातर सामाजिक जिम्मेदारियां सुनिश्चित करनी होती है.

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जर्मनी के संघीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, 2024 में स्थानीय निकाय ने कुल 400 अरब यूरो खर्च किए थे. 2025 में यह खर्च और अधिक बढ़ने का अनुमान है. चूंकि, कर्मचारियों के वेतन और ऊर्जा की लागत बढ़ रही है. इन खर्चों का सबसे बड़ा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जाता है.

श्पीगलर के अनुसार, "पिछले 20 सालों में इन खर्चों में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई हैं, लेकिन इसे पूरा करने वाली फंडिंग ना के बराबर बढ़ी है.”

बच्चों और युवाओं के लिए भत्ता, देखभाल सेवाओं और दिव्यांग लोगों के लिए एकीकरण सहायता पर साल 2007 में ही करीब 38 अरब यूरो का खर्च आया था. तब से लेकर अब तक यह खर्च लगातार बढ़ा ही है. अनुमान है कि साल 2027 में इन सेवाओं पर 102 अरब यूरो से भी अधिक का खर्च आ सकता है.

न्यायपूर्ण बंटवारे की मांग

जिन शरणार्थियों और प्रवासियों को जर्मनी में कानूनी रूप से रहने की अनुमति मिल गई है, उन्हें समाज का हिस्सा बनाना अब भी आसान नहीं है. स्कूल, भाषा और एकीकरण कोर्स चलाने वाली संस्थाएं, रोजगार कार्यालय और खास तौर पर इमिग्रेशन दफ्तर अपनी क्षमता से अधिक काम करने के लिए मजबूर हैं. इसके चलते जर्मनी की स्थानीय निकाय संघ ने सामाजिक सेवाओं की लागत बांटने का एक नया तरीका सुझाया है. इसके तहत भविष्य में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय सरकार तीनों को जरूरी फंडिंग का एक-तिहाई हिस्सा देना होगा.

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इसके अलावा, स्थानीय सरकारें चाहती हैं कि उन्हें भी कानून निर्माण प्रक्रिया में शामिल किया जाए. अभी तक जर्मनी में कानून केवल केंद्र और राज्य सरकार ही बनाती हैं.

श्पीगलर ने कहा, "इस तरह न सिर्फ आर्थिक बोझ, बल्कि सामाजिक सेवाओं में सुधार लाने की जिम्मेदारी भी सरकार के सभी स्तरों में बंट जाएगी.”

जिम्मेदारियां बढ़ीं, संसाधन घटे

कुछ समूह तो सरकार से कानूनी जिम्मेदारी सुनिश्चित करने भी मांग कर रहे हैं. नवंबर में जर्मनी के सभी 16 राज्यों की राजधानियों के मेयरों ने केंद्र सरकार से अपील की कि कोई भी नया कानून अगर भविष्य में स्थानीय नगरपालिकाओं पर खर्च का बोझ डाले, तो उसमें पहले से ही मुआवजा देने की योजना भी शामिल होनी चाहिए. इस मांग के अनुसार , "जो आदेश दे, वह खर्च उठाए.”

केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के कुल वार्षिक खर्च में लगभग 25 फीसदी खर्च स्थानीय निकाय की जिम्मेदारी होता है. लेकिन यह हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है. "असंतुलन” की बात करते हुए श्पीगलर ने कहा, "स्थानीय सरकारों को कुल टैक्स आय का सिर्फ 14 फीसदी ही मिलता है.” स्थानीय सरकारों के खजाने में यह घाटा साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है.

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श्पीगलर ने कहा, "हमने स्थानीय टैक्स (जैसे जमीन और स्थानीय व्यापार टैक्स) लोगों की सहन शक्ति की हद तक बढ़ा दिए हैं.” हर जगह बचत और खर्च में कटौती की जा रही है. कई नगरपालिकाओं ने तो निर्माण परियोजनाएं भी रोक दी हैं, सांस्कृतिक और सामुदायिक कार्यक्रमों को भी स्थगित कर दिया गया है.

स्थानीय निकाय संघ के अनुसार, अब बेहतर भविष्य के लिए निवेश करना संभव नहीं रह गया है. स्थानीय सरकारों के पास तो मौजूदा इमारतों की मरम्मत और रखरखाव के लिए भी पैसा नहीं बचा है.अनुमान है कि स्कूलों, नगर भवनों, किंडरगार्टन, स्विमिंग पूल, पुलों और सड़कों की मरम्मत के लिए करीब 218 अरब यूरो की जरूरत है.

चूंकि, स्थानीय निकायों को कर्मचारियों केवेतन, हीटिंग और ऊर्जा जैसे नियमित खर्चों के लिए लंबी अवधि वाले कर्ज लेने की अनुमति नहीं है. इसलिए वह लगातार कम अवधि वाले अस्थायी कर्ज उठाने को मजबूर हैं. लेकिन यह कर्ज काफी महंगे साबित हो रहे हैं.

जर्मनी की राज्य और केंद्र सरकारें स्थानीय सरकारों की आर्थिक समस्याओं से अच्छी तरह वाकिफ हैं. सामाजिक सेवाओं के मुद्दे पर नवंबर की शुरुआत में जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कहा, "हमें नगरपालिकाओं की मदद करनी होगी.”

हालांकि, जर्मनी के आर्थिक तनाव के बीच वह राज्य और केंद्र सरकारें खुद अपने-अपने बजट संकट से जूझ रही हैं.

वहीं, जर्मनी के वित्त मंत्री लार्स क्लिंगबाइल ने दिसंबर में स्थानीय सरकारों को राहत देने के उपायों की घोषणा तो की लेकिन इसके बारे में कोई ठोस विवरण नहीं दिया.

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