भारत‑ईयू समझौते से गहराया बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग का संकट
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहे बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग पर भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के कारण संकट और बढ़ा. इसके कारण करीब दस लाख लोगों पर बेरोजगारी की खतरा मंडरा रहा है.बांग्लादेश में फिलहाल पचासों कपड़ा मिलें बंद हैं और हजारों लोग बेरोजगार हैं. अब इस समझौते के कारण पूरे उद्योग का भविष्य अनिश्चित हो गया है. देश के मिल मालिकों ने भारत से धागों का ड्यूटी फ्री आयात तत्काल बंद करने, बिजली और गैस में सब्सिडी देने और बैंकों की ब्याज दर घटाने के अलावा कई नीतिगत बदलाव करने की मांग उठाई है. ऐसा नहीं होने की स्थिति में उन्होंने एक फरवरी से बेमियादी हड़ताल की चेतावनी दी है.

विश्लेषकों का कहना है कि इस समझौते से बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग को भारी झटका लग सकता है. इस उद्योग को बचाने के लिए ही मिल मालिकों ने बेमियादी हड़ताल की चेतावनी दी है.

यूरोपीय संघ के कपड़ा बाजार पर फिलहाल चीन, वियतनाम और बांग्लादेश का ही दबदबा है.

'बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग राष्ट्रीय संकट के कगार पर'

बागालादेश टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन (बीटीएमए) के अध्यक्ष अजीज रसेल ने राजधानी ढाका में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, "देश का कपड़ा उद्योग राष्ट्रीय संकट के कगार पर खड़ा है. सस्ती कीमत वाले भारतीय धागे और कपड़े तेजी से हमारे बाजारों पर कब्जा कर रहे हैं. इसके कारण देश में कपड़ा तैयार करने का करीब साढ़े बारह हजार करोड़ का कच्चा माल गोदामों में नष्ट हो रहा है."

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश में वर्ष 2025 में करीब 70 करोड़ किलो धागे का आयात किया था. इसका बाजार मूल्य करीब दो सौ करोड़ डालर है. लेकिन अब बांग्लादेश के मिल मालिक भारत से इसका आयात बंद करने की मांग कर रहे हैं.

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि सस्ती मजदूरी के कारण अमेरिका से यूरोप तक के तमाम देशों के मशहूर ब्रांड के ज्यादातर रेडीमेड कपड़े अब तक राजधानी ढाका और आसपास के इलाको में स्थित कपड़ा मिलो में तैयार होते रहे हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, अब भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के कारण इस पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

शेख हसीना सरकार के सत्ता में रहने तक भारतीय धागों और कपड़ों से रेडीमेड ड्रेस बना कर बांग्लादेश ने दुनिया में कपड़ों के कारोबार के करीब दस फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया था. वह चीन के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया था. इस सूची में भारत का चौथा स्थान है.

कबसे बजी खतरे की घंटी

विशेषज्ञों का कहना है कि हसीना सरकार के कार्यकाल में भारत से सस्ती कीमत पर धागे और कपड़े मिलने और विदेशी ब्रांडों के साथ रेडीमेड कपड़े तैयार करने के समझौते की वजह से बांग्लादेश में कपड़ों के निर्यात का कारोबार आसमान छू रहा था. यहां बनने वाले ऐसे पोशाकों को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भेज दिया जाता था. लेकिन अब मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत भी प्रतिदंद्वी दर पर यूरोपीय देशों में कपड़े और रेडीमेड पोशाक का निर्यात कर सकेगा.

ज्यादातर विश्लेषकों का कहना है कि यूरोपीय बाजारों में भारत की घुसपैठ के बाद बांग्लादेशी निर्यातकों को वहां से काम समेटना पड़ सकता है. इसका असर विदेशी मुद्रा भंडार और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी पड़ेगा. इस साल की शुरुआत में ही बांग्लादेश में निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में बांग्लादेश ने कुल साढ़े पांच हजार करोड़ डालर का निर्यात किया था. इनमें कपड़ों और रेडीमेड ड्रेस के निर्यात से आने वाली रकम का हिस्सा 3,848 करोड़ डालर था. देश ने उस साल यूरोपीय संघ के देशों को 1,937 करोड़ डालर के कपड़ों और रेडीमेड ड्रेस का निर्यात किया था. उसके अलावा अमेरिका को 720 करोड़ और ब्रिटेन को 433 करोड़ डालर का निर्यात हुआ था.

वैश्विक व्यापार में 2025 रहा नये टैरिफ और बदलावों का साल

अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस के 2025 में चीन दौरे पर जाने और वहां भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को अलग-थलग करने की चेतावनी के बाद भारत ने बांग्लादेश की ट्रांसशिपमेंट की सुविधा बंद कर दी थी. हसीना सरकार के कार्यकाल में मिली इस सहूलियत के कारण बांग्लादेश पश्चिम बंगाल या पूर्वी भारत के किसी बंदरगाह से नेपाल और भूटान को अपना सामान भेज सकता था. इसके कारण उसके निर्यात का खर्च भी तेजी से बढ़ गया.

बीते साल अप्रैल में ही अमेरिका के नए राष्ट्रपति ट्रंप ने नई पारस्परिक टैरिफ नीति लागू की थी. इससे अमेरिकी बाजारों में बांग्लादेश के उत्पादों पर 35 फीसदी टैरिफ लगा दिया गया था. तब भारतीय सामग्री पर 25 फीसदी टैरिफ था. इससे अमेरिका के कपड़ा बाजार में भारत को बढ़त मिल गई. इससे बांग्लादेश का विदेश व्यापार घाटा भी बढ़ा है.

कपड़ा उद्योग से जुड़े फैसल समद डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यूरोपीय संघ के देशों में कपड़ों के करीब 263 अरब डालर के बाजार में करीब 30 फीसदी हिस्सेदारी के साथ चीन पहले स्थान पर है. उसके बाद ही 22 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बांग्लादेश का स्थान था. लेकिन भारत का हिस्सा महज पांच से छह फीसदी के बीच ही है. इसकी वजह भारतीय कपड़ों के निर्यात पर लगने वाला नौ से 12 फीसदी तक का टैक्स है. अब टैक्स राहत मिलने के बाद वो तेजी से निर्यात बढ़ा सकेगा."

बांग्लादेशी अर्थशास्त्री अब्दुर रज्जाक का कहना है कि कपड़ों के निर्यात के मामले में भारत बांग्लादेश को तेजी से पिछाड़ सकता है. उसके पास विभिन्न तरह के कपड़े बनाने की क्षमता और तकनीक के साथ ही कच्चे माल की भी कोई कमी नहीं है. इसके अलावा बांग्लादेश के उलट वहां राजनीतिक स्थिरता है.

रज्जाक ने स्थानीय अखबार दे डेली स्टार में लिखे अपने एक लेख में कहा है, "प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि के बिना निर्यात के क्षेत्र में वृद्धि को बनाए रखना मुश्किल होगा. निर्यात-आधारित उद्योगों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए जरूरी इंसेंटिव के साथ ही उद्योग समर्थक नीतियां तैयार करना भी किसी क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काफी महत्वपूर्ण है."

भारतीय निर्यात बढ़ने की संभावना

भारत फिलहाल करीब 36.7 अरब डालर के कपड़ों का निर्यात करता है. इसमें यूरोपीय संघ का हिस्सा महज 7.2 अरब डालर ही है. लेकिन नए समझौते से आने वाले वर्षो में इसके कई गुना बढ़ने की संभावना है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगले पांच वर्षो में यूरोपीय संघ को होने वाला भारतीय निर्यात दोगुना बढ़ कर 15 अरब डालर तक पहुंच सकता है. इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा.

थिंक टैंक सेंटर फॉर पालिसी डायलॉग (सीपीडी) के फेलो मुस्तफिजुर रहमान ने ढाका में पत्रकारों से कहा, "कपड़ा उद्योग पर इस समझौते का काफी असर पड़ने की संभावना है. भारत को ड्यूटी से राहत मिलने की स्थिति में बांग्लादेश प्रतिद्वंद्विता में काफी पिछड़ जाएगा."

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बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के निदेशक फैसल समद ने पत्रकारों से कहा, "भारत-यूरोपीय संघ समझौते का बांग्लादेश के निर्यात पर कोई तात्कालिक असर तो नहीं पड़ेगा. इसका असर धीरे-धीरे महसूस होगा. वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान बांग्लादेश के कुल कपड़ा निर्यात का आधे से ज्यादा हिस्सा यूरोपीय संघ के देशों को ही हुआ था. इससे देश को 19.71 अरब डालर की रकम मिली थी."

उन्होंने कहा कि कच्चे कपास और मानव संसाधन के साथ ही सरकार से मिलने वाले व्यापक वित्तीय और नीतिगत समर्थन भारत की प्रमुख ताकत है.

कपड़ा उद्योग से जुड़े लोगों ने इस समझौते को एक चेतावनी बताते हुए सरकार से समुचित कदम उठाने की अपील की है ताकि यूरोपीय बाजारों तक उसकी पहले जैसी पहुंच कायम रह सके.

बांग्लादेश टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष शौकत अजीज रसेल डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार को बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग को विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए करों में छूट के साथ ही नीतिगत बदलावों के जरिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए."