यूरोपीय संसद के एक सांसद ने यूरोपीय नेताओं से अपील की है कि वे ट्रांस अटलांटिक रिश्तों में हालिया तनाव को देखते हुए “यूरोपीय परमाणु छतरी” पर ठोस बातचीत करें.यूरोपीय संसद के एक सांसद ने यूरोपीय नेताओं से अपील की है कि वे ट्रांस अटलांटिक रिश्तों में हालिया तनाव को देखते हुए "यूरोपीय परमाणु छतरी” पर ठोस बातचीत करें. यूरोप में अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो रही है और फ्रांस के परमाणु जखीरे को यूरोपीय रक्षा के लिए उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर भी चर्चा चल रही है.
यूरोपीय संसद में यूरोपीय पीपल्स पार्टी के प्रमुख मानफ्रेड वेबर ने फ्रांस के प्रस्ताव का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि फ्रांस अपना परमाणु शस्त्रागार यूरोपीय रक्षा के लिए उपलब्ध करा सकता है, यह एक "उदार पेशकश” है. वेबर ने खास तौर पर "अमेरिका में नए घटनाक्रम” का जिक्र करते हुए कहा कि अब यूरोपीय नेताओं को गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि फ्रांसीसी परमाणु हथियार यूरोपीय सुरक्षा के लिए किस तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट का अनुमान है फ्रांस के पास 280 परमाणु हथियार हैं, जबकि अमेरिका के पास 1,770. यूरोप में परमाणु हथियार रखने वाला दूसरा और एकमात्र देश ब्रिटेन है.
नाटो की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता मुख्य रूप से अमेरिकी परमाणु हथियारों पर आधारित है. अनुमान के अनुसार, अमेरिका के करीब 100 परमाणु हथियार यूरोप में तैनात हैं. इनमें जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड और इटली जैसे देश शामिल हैं.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने पहली बार 2020 में ही यूरोपीय परमाणु प्रतिरोधक सहयोग पर बातचीत का सुझाव दिया था. उस समय डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका में अपने पहले कार्यकाल में थे. अब ट्रंप के दोबारा पद पर लौटने के बाद उनके "अप्रत्याशित कदमों” ने यूरोपीय संघ में रक्षा के लिए ज्यादा जिम्मेदारी लेने की कोशिशों को गति दी है.
पिछले कुछ हफ्तों में ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण लेने के लिए आक्रामक प्रयास किया है, जबकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सहयोगी देश है.
आसान नहीं है परमाणु तैनाती
हालांकि इस बहस के साथ एक चिंता भी जुड़ी है. आशंका है कि अगर यूरोप अपनी "खुद की परमाणु छतरी” बनाने की दिशा में बढ़ता है तो ट्रंप यूरोप से अमेरिकी परमाणु हथियार हटाने का फैसला कर सकते हैं. यानी यूरोप जहां ज्यादा आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था की बात कर रहा है, वहीं यह भी डर है कि उससे अमेरिका की परमाणु उपस्थिति पर असर पड़ सकता है.
यूरोपीय परमाणु ढाल के सामने वित्तीय और संगठनात्मक चुनौतियां भी हैं. यानी सिर्फ राजनीतिक सहमति काफी नहीं होगी, बल्कि खर्च, ढांचा और कमान नियंत्रण जैसे सवाल भी सामने आएंगे. सैद्धांतिक तौर पर फ्रांस सार्वजनिक रूप से यह गारंटी दे सकता है कि वह यूरोपीय हितों की रक्षा के लिए अपने परमाणु हथियार इस्तेमाल करने के लिए तैयार है. यूरोपीय संघ की संधि में पारस्परिक सहायता का एक प्रावधान है. इसके बावजूद, फ्रांस की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण शर्त भी है.
माक्रों ने साफ कर दिया है कि फ्रांसीसी परमाणु हथियारों से जुड़ा कोई भी निर्णय पेरिस के हाथ में ही रहेगा. इसका मतलब यह होगा कि हथियार कड़ी फ्रांसीसी नियंत्रण व्यवस्था के तहत ही रहेंगे. साथ ही जहां भी वे रखे जाएंगे, उन स्थानों की सुरक्षा फ्रांसीसी सशस्त्र बलों को करनी होगी. यानी यह कोई साझा नियंत्रण वाला मॉडल नहीं होगा, बल्कि फ्रांस के नियंत्रण के भीतर यूरोपीय सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता का ढांचा हो सकता है.
पहले भी हुई है बातचीत
फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के बीच इस विषय पर बातचीत पहले भी हुई थी. यह बातचीत जर्मनी के तत्कालीन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स के कार्यकाल में हुई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि ये बातचीत कितनी गहन थी. फ्रीडरिष मैर्त्स ने इसी हफ्ते एक बयान में कहा कि बातचीत "बहुत शुरुआती चरण” में थी.
मैर्त्स ने अपनी ओर से यह भी कहा कि जर्मनी अपने खुद के परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा. उन्होंने इस फैसले का आधार दो अंतरराष्ट्रीय रूप से बाध्यकारी संधियों को बताया. एक जर्मनी के एकीकरण से जुड़ी "टू प्लस फोर” संधि और दूसरी परमाणु अप्रसार संधि. मैर्त्स के अनुसार, इन संधियों के तहत बर्लिन ने अपने परमाणु हथियार ना रखने की प्रतिबद्धता ली हुई है.
परमाणु सुरक्षा को लेकर यूरोप पर दोहरा दबाव है. एक तरफ ट्रांस अटलांटिक रिश्तों में तनाव और अमेरिका की भूमिका को लेकर अनिश्चितता, दूसरी तरफ यूरोप की अपनी रक्षा जरूरतें और उन्हें पूरा करने के लिए विकल्पों पर बढ़ती बहस. मानफ्रेड वेबर का कहना है कि फ्रांस के परमाणु शस्त्रागार को लेकर माक्रों की पेशकश के बाद अब "ठोस बातचीत” का समय है, ताकि यूरोपीय सुरक्षा के लिए संभावित ढांचे पर गंभीर निर्णय की दिशा बन सके.













QuickLY