पाकिस्तान में जिस तरह से चरमपंथी हमले और हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं, वह शहबाज शरीफ सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है. इससे पार पाने में पाकिस्तान की सरकार संघर्ष करती नजर आ रही है.बीते शुक्रवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक शिया मस्जिद को निशाना बनाकर किए गए आत्मघाती बम विस्फोट ने देश की डगमगाती सुरक्षा स्थिति पर एक बार फिर सबका ध्यान खींचा है. इस धमाके ने फिर से यह उजागर कर दिया है कि पाकिस्तान में सुरक्षा के हालात कितने गंभीर और चिंताजनक हैं.
इस धमाके में कम से कम 31 लोग मारे गए और 169 लोग घायल हुए हैं. जब यह धमाका हुआ, तब 34 साल के हुसैन अली और उनके भाई मस्जिद में थे. अली ने डीडब्ल्यू को बताया, "लोग भागने लगे. चारों ओर चीख-पुकार मच गई. फर्श और नमाज की चटाई पर धुआं और खून फैला हुआ था. इस घटना में मैंने अपने भाई अब्बास को खो दिया.”
इस्लामिक स्टेट के क्षेत्रीय गुट ‘इस्लामिक स्टेट इन पाकिस्तान' नामक संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है. मैरियट होटल में 2008 में हुए आत्मघाती विस्फोट के बाद, यह हालिया धमाका इस्लामाबाद में हुई सबसे घातक घटना है. मैरियट होटल पर हुए हमले में 63 लोग मारे गए थे और 250 से अधिक घायल हुए थे.
पाकिस्तान के बिगड़ते सुरक्षा हालात
पाकिस्तान की आबादी करीब 24.1 करोड़ है. यहां सुन्नी मुसलमानों की आबादी सबसे ज्यादा है. वहीं, शिया एक अल्पसंख्यक समुदाय है. यह समुदाय पहले भी सांप्रदायिक हिंसा का निशाना बनता रहा है. इसके अलावा, ‘इस्लामिक स्टेट' और सुन्नी चरमपंथी समूह ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' इस अल्पसंख्यक समूह को निशाना बनाकर हमला करते रहे हैं.
मस्जिद पर यह ताजा हमला ऐसे समय में हुआ है जब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पूरे देश में बढ़ते चरमपंथी हमलों से निपटने के लिए संघर्ष कर रही है.
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इस्लामाबाद में रहने वाले सुरक्षा विश्लेषक इहसानुल्लाह टीपू महसूद ने कहा, "पाकिस्तान मौजूदा समय में पाकिस्तानी तालिबान के विभिन्न गुटों और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) से गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है.”
उन्होंने विस्तार से बताया, "टीटीपी के पास बड़ी संख्या में लड़ाके हैं और इसका नेटवर्क भी बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है. वे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं. साथ ही, टीटीपी के दुष्प्रचार का तरीका भी काफी आधुनिक और प्रभावशाली है.”
वह आगे बताते हैं, "टीटीपी के पास अफगानिस्तान में सीमा पार सुरक्षित ठिकाने मौजूद हैं. उसके पास कमाई के कई स्रोत हैं. इसके अलावा, आईएसकेपी की तुलना में स्थानीय आबादी तक उसकी पैठ भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान शांति वार्ता नाकामकहीं ज्यादा है.”
महसूद कहते हैं, "वहीं दूसरी ओर अगर आईएसकेपी की बात करें, तो यह तुलनात्मक रूप से छोटा गुट है, लेकिन गंभीर चुनौती बना हुआ है. यह ऐसा खतरा है जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इसके हमले इतने अचूक और रणनीति इतनी गुप्त होती है कि समय रहते पता लगाना मुश्किल हो जाता है. यह बहुत तेजी से अपनी रणनीतियों को बदलता है.”
उन्होंने बताया, "आईएसकेपी में चोट खाने के बाद भी फिर से उठ खड़े होने की क्षमता है. हाल के वर्षों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान, दोनों जगह उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है, फिर भी वह अपनी गतिविधियां लगातार जारी रखे हुए है.”
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पाकिस्तान के अधिकारी इस दावे को खारिज करते हैं कि सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है. वे विफल की गई कई साजिशों और खुफिया जानकारी पर आधारित मौजूदा ऑपरेशन का हवाला देते हैं. वे हाल के हमले की साजिश रचने और उसे अंजाम देने में कथित तौर पर शामिल कई संदिग्धों की गिरफ्तारी का भी जिक्र करते हैं.
पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाह चौधरी ने डीडब्ल्यू से कहा, "हमने धमाकों के साजिशकर्ताओं को चंद घंटों के भीतर गिरफ्तार कर लिया है. हम अपने देश से आतंकवाद को खत्म करने के लिए उनसे लड़ेंगे. हम उन्हें छोड़ेंगे नहीं.”
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इलाके में बिगड़ती सुरक्षा के लिए अफगानिस्तान के सत्ताधारी तालिबान को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि अफगान तालिबान ने 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका को निशाना बनाकर किए गए हमलों से पहले के "जैसे या उससे भी बुरे” हालात पैदा कर दिए हैं.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा कि शिया मस्जिद पर हमला करने वाले आत्मघाती हमलावर का अफगानिस्तान आने-जाने का इतिहास रहा है. उन्होंने कहा कि इस घटना से संकेत मिलता है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तानी चरमपंथी अब सीधे तौर पर देश की राजधानी में भी हमला कर सकते हैं.
रक्षा मंत्री ने बिना किसी ठोस प्रमाण के इस आतंकी हमले के पीछे भारत का हाथ होने का भी आरोप लगाया है. वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने मस्जिद पर हमले की निंदा की और इसमें शामिल होने के आरोपों को ‘बेबुनियाद' बताया.
अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी इन आरोपों को गलत बताया कि काबुल पाकिस्तान में हमले करने वाले चरमपंथियों को पनाह देता है.
कैसे सुधरेगी पाकिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था?
सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक इम्तियाज गुल ने कहा कि जब तक पाकिस्तानी सरकार ‘सभी राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों को साथ लेकर नहीं चलेगी, तब तक स्थिति में सुधार की उम्मीद कम है.'
गुल ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "इसके लिए सुरक्षा तंत्र को बढ़ाने के बजाय, आपसी विश्वास और भरोसे को बढ़ाने की जरूरत है.”
महसूद का भी कुछ ऐसा ही मानना है. उन्होंने जोर देकर कहा, "बिगड़ते सुरक्षा हालातों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए पाकिस्तान को सैन्य शक्ति और सॉफ्ट पावर के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है. जैसे, बेहतर शासन, पिछड़े क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं की पहुंच और जनता के मन में सरकार के प्रति विश्वास जगाना.”
उन्होंने आगे कहा, "अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी गुटों के प्रति तालिबान के नजरिए को बदलने के लिए पाकिस्तान को दोहरी रणनीति अपनानी होगी. उसे ताकत के साथ-साथ कूटनीतिक बातचीत का भी इस्तेमाल करने की जरूरत है.”












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