प्रत्येक वर्ष चातुर्मास के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर जब भगवान विष्णु योग निद्रा से जागृत होते हैं, उसी दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से माता तुलसी (तुलसी पौधे के रूप में) का विवाह सम्पन्न किया जाता है. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार इसी दिन से देवताओं का विश्राम काल समाप्त होता है, और विवाह समेत सभी शुभ कार्य आदि प्रारंभ किये जाते हैं. आइये बात करते हैं तुलसी विवाह के महत्व, वैवाहिक विधि एवं इसमें लगने वाली सामग्री के बारे में यह भी पढ़ें : Haryana Foundation Day 2025 Wishes: हरियाणा दिवस के इन हिंदी WhatsApp Messages, Quotes, Facebook Greetings के जरिए दें शुभकामनाएं
तुलसी विवाह की सामग्री
तुलसी का पौधा
शालिग्राम भगवान या विष्णु की प्रतिमा अथवा तस्वीर
नया वस्त्र (लाल या पीली चुनरी)
धागा, मंगळसूत्र, बिंदी, सिंदूर, फूल, माला, पत्तियां (तुलसी को सजाने के लिए)
चावल, हल्दी, कुमकुम, रोली, कलश, गंगाजल, अक्षत, नारियल, सुपारी, पान, लौंग, इलायची, कलश, गंगाजल, अक्षत (पूजा के लिए)
दीपक, रुई, घी, अगरबत्ती (आरती के लिए)
फल, मिठाई, पंचामृत, प्रसाद (भोग के लिए)
पीला वस्त्र (दूल्हे के लिए)
तुलसी विवाह विधि
तुलसी के पौधे को स्वच्छ जगह पर रखें. उसके चारों ओर 4 गन्ने से मंडप बनाएं. रंगोली बनाएं.
अब तुलसी माता को चुनरी, बिंदी, कंगन, और मंगलसूत्र आदि से सजाएं. इन्हें वधू के रूप में तैयार करें. इसके बाद तुलसी माता के सामने भगवान शालिग्राम जी को पीला वस्त्र, मुकुट आदि पहनाकर एक चौकी पर स्थापित करें.
एक कलश पर आम के पांच पत्ते रखें, इस पर जटावाला नारियल रखें. कलश पर स्वास्तिक का चिह्न बनाएं.
अब प्रथम गणेश जी, एवं विष्णु जी और माता तुलसी का आह्वान मंत्र पढ़े.
गणेश जी का आह्वान मंत्र- ‘ॐ गं गणपतये नमो नमः’
शालिग्राम जी का आह्वान मंत्र- ‘ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्’
‘नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये’
शालिग्राम-तुलसी विवाह संस्कार:
शालिग्राम तुलसी विवाह की रस्में पुरोहित अथवा घर के मुख्य सदस्य पूरी करते हैं. तुलसी जी और शालीग्राम जी के बीच में एक परदा सरीखा कपड़ा रखा जाता है. विवाह के निम्न मंत्र पढ़े जाते हैं.
‘देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः,
नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।‘
इसके बाद तुलसी जी की माला शालिग्राम जी को और शालिग्राम जी का माला तुलसी जी को पहनाई जाती है. फिर तुलसी जी के पौधे के चारों ओर फेरे लिये जाते हैं. अंत में तुलसी जी को पीला सिंदूर चढ़ाया जाता है. अब शालिग्रामजी औऱ तुलसी जी की आरती उतारते हैं, अंत में लोगों में प्रसाद वितरित किया जाता है.
तुलसी विवाह का महत्व
मान्यता है कि शालिग्राम जी औऱ तुलसी जी का विवाह करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. विवाह कराने वाले जातक को कन्यादान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है. इसके बाद से ही हिंदू घरों में शुभ विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार जैसे पुण्य कार्यों की शुरुआत होती है.













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