शहीद उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब (अब हरियाणा) के हिसार जिले में हुआ था. पिता का नाम निहाल सिंह और मां नारायण कौर उर्फ नरेन कौर थीं. माता-पिता और भाई मुक्ता सिंह की मृत्यु के बाद उन्होंने अपना बचपन अनाथालय में गुजारा, वहीं से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की. उधम सिंह के अंदर बचपन से ब्रिटिश हुकूमत के प्रति आक्रोश था, जलियांवाला कांड और भगत सिंह के क्रांतिकारी कार्यों से प्रभावित होकर वह भी क्रांतिकारी बने. शहीद उधम सिंह की 85वीं पुण्यतिथि पर आइये जानें उनके क्रांतिकारी जीवन के कुछ रोमांचक लम्हों के बारे में.
जलियांवाला बाग कांड और उधम सिंह की सौगंध
13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में जब ब्रिटिश सैनिकों ने सैकड़ों निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, तो इस घृणित नरसंहार से युवा उधम सिंह का खून खौल उठा था. कहा जाता है कि उस समय वह प्रदर्शनकारियों को पानी पिला रहे थे, संयोगवश वह इस भयंकर गोलीबारी से बच गये थे. उन्होंने उसी समय सौगंध ली कि घृणित नरसंहार के मुख्य अपराधी जनरल डायर को मौत के घाट उतारकर ही दम लेंगे. यह भी पढ़ें : Raksha Bandhan 2025: कब और किस मुहूर्त में बांधें बहनें भाई की कलाई पर राखी? जानें कब से कब तक है भद्रा काल!
कभी मोहम्मद सिंह आजाद तो कभी फ्रैंक ब्राजील बनना
अपने मकसद को पूरा करने के लिए उधम सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी बन चुके थे, जिन्होंने महाद्वीपों के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की और अधिकारियों से बचने और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए फ्रैंक ब्राज़ील और मोहम्मद सिंह आज़ाद जैसे उपनाम रखना पड़ा. साल 1924 में वह ग़दर पार्टी में शामिल हो गए, जिसका मूल उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत जड़ से उखाड़ फेंकना था. इसके अलावा उन्होंने आजाद पार्टी का भी गठन किया, जिससे उनके क्रांतिकारी नेटवर्क और प्रयासों को सही दशा-दिशा मिले.
माइकल ओ'डायर की हत्या और मुकदमा
21 सालों के अथक प्रयासों के बाद उधम सिंह को अपना मकसद पूरा करने का अवसर मिला. उन्हें कहीं खबर मिली कि 13 मार्च 1940 को ‘रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी’ की लंदन के ‘कॉक्सटन हॉल’ में बैठक के लिए माइकल ओ’डायर भी अपनी बात रखने आने वाले थे. ऊधम सिंह ने एक मोटी पुस्तक के अंदर के पन्नों को इस तरह काटा ताकि उसमें रिवाल्वर आ जाए. अपनी रिवाल्वर उस पुस्तक में छिपाकर वह कॉक्सटन हॉल पहुंचे. उपयुक्त अवसर मिलते ही उन्होंने माइकल ओ’डायर पर कई राउंड गोलियां चलाई और मौके पर ही माइकल ओ’ डायर की मौत हो गई. घटना को अंजाम देकर वह भागे नहीं. पुलिस ने उन्हें रिवाल्वर के साथ ही गिरफ्तार कर लिया. अदालत के फैसले के अनुसार 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई.













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