त्योहार

Chattrasal Jayanti 2023: जब छत्रपति की छत्रछाया में महाराजा छत्रपाल का मुगलों को नेस्तनाबूद करने का लिया संकल्प!

छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1716 (सन 1649) को वर्धमान टीकमगढ़ के कांकेर ग्राम के जंगलों में हुआ था. छत्रसाल की माँ लाल कुंवरी भी एक जांबाज वीरांगना थीं. युद्ध के दरम्यान वह चंपत राय के साथ ही रहती थी. गर्भस्थ शिशु छत्रपाल ने तलवारों की खनक और युद्ध नीति तो शायद माँ की गर्भ में ही रहकर सीख लिया था.

Chattrasal Jayanti 2023: जब छत्रपति की छत्रछाया में महाराजा छत्रपाल का मुगलों को नेस्तनाबूद करने का लिया संकल्प!
छत्रसाल जयंती 2023 (Photo Credits: Twitter)

तमाम रण बांकुरों से भरा है भारत का स्वर्णिम इतिहास. उनकी लड़ाईयां, उनका संघर्ष और देश प्रेम की गाथाएं जनमानस के मन में अमिट छाप छोड़ती हैं. ऐसे ही एक महानायक थे महाराजा छत्रसाल, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा है. 82 साल की उम्र और 44 वर्ष के राज्यकाल में छत्रसाल ने 52 युद्ध लड़े थे. छत्रसाल केवल तलवार के योद्धा नहीं थे, बल्कि कलम के भी महान योद्धा के रूप में जाने जाते हैं. हालांकि उनके जीवन की शुरुआत तमाम कठिनाइयों एवं संघर्ष से गुजरी है. उन्हें ‘बुंदेलकेशरी’ के नाम से भी पुकारा जाता है, 22 मई 2023 को देश भर में उनकी जयंती मनाई जाएगी. इस अवसर पर आइये इस महान योद्धा के प्रेरक प्रसंगों को जानें.

संघर्षों के साथ जीवन की शुरुआत!

छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1716 (सन 1649) को वर्धमान टीकमगढ़ के कांकेर ग्राम के जंगलों में हुआ था. छत्रसाल की माँ लाल कुंवरी भी एक जांबाज वीरांगना थीं. युद्ध के दरम्यान वह चंपत राय के साथ ही रहती थी. गर्भस्थ शिशु छत्रपाल ने तलवारों की खनक और युद्ध नीति तो शायद माँ की गर्भ में ही रहकर सीख लिया था. वहीं लाल कुंवरी की धर्म एवं संस्कृति से संबंधित कहानियां बालक छत्रसाल को और भी बहादुर बना रही थीं. वे जब मात्र 12 वर्ष के थे, औरंगजेब के इशारे पर उनके पिता महेवा नरेश चंपत राय की धोखे से हत्या करवा दी गई. पति के साथ लाल कुवरी ने भी आत्मदाह कर लिया.

मुगलों की चाकरी न करने का संकल्प!

   पिता के निधन के पश्चात छत्रसाल उनके मित्र राजा जयसिंह की सेना में भर्ती हो गए. जयसिंह औरंगजेब के अधीन कार्य करते थे. छत्रसाल के शौर्य से प्रसन्न होकर शीघ्र ही जयसिंह ने उन्हें अपना मुख्य सेनापति बना दिया.1665 में बीजापुर युद्ध में छत्रसाल ने असाधारण वीरता का प्रदर्शन करते हुए देवगढ़ छिंदवाड़ा के गोंड राजा को पराजित किया, लेकिन औरंगजेब ने जीत का सेहरा छत्रसाल के बजाय किसी और के सर पर बांधा. इससे विक्षिप्त होकर छत्रपाल ने संकल्प लिया कि अब वह मुगलों की चाकरी नहीं करेंगे. उन्होंने छत्रपति शिवाजी से मिलने की योजना बनाई.

छत्रपति की छत्रछाया में

 1668 में छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से मुलाकात की. शिवाजी ने छत्रसाल के युद्ध कौशल और शूरवीरता की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मगर यह भी कहा कि आपने यह वीरता मुगलों की गुलामी में रहकर दिखाई. छत्रसाल ने कहा, -मैंने मुगलों की गुलामी छोड़ दी है. मैं आपके पूर्ण स्वाधीनता और अखंड भारत के सपने को पूरा करने के लिए जी-जान लगाने के लिए तैयार हूं. शिवाजी ने उनसे कहा, तुम बुंदेलखंड का पूरा मोर्चा संभालो. छत्रसाल उनसे मंत्रणा कर बुंदेलखंड में मुगलों को परास्त कर अपना शासन चलाते रहे.

औरंगजेब की ‘मंदिर तोड़ो’ नीति का विरोध!

   छत्रपति शिवाजी से मुलाकात के बाद जब छत्रसाल बुंदेलखंड की ओर बढ़े, तब उनके पास मात्र 30 घुड़सवार और 300 पैदल सैनिक ही थे, परंतु फिदाई खां द्वारा ओरछा पर आक्रमण और औरंगजेब की मंदिरों को नष्ट करने की नीति ने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात किया, जिससे भारी संख्या में बुंदेलखंड की जनता छत्रसाल के साथ हो गई. सभी की बस एक ही कामना थी कि पुनः कोई वीर बुंदेला चंपत राय के शौर्यपूर्ण कार्यों को दोहराए, और हिंदू धर्म की रक्षा के लिये मुगलों का सर्वनाश करने का संकल्प ले. इस तरह देखते ही देखते छत्रसाल की सैन्य शक्ति में इतना इजाफा हो गया कि वे मुगलई सत्ता को खुली चुनौतियां देने लगे. मुगलों के खिलाफ छत्रसाल ने 52 से अधिक युद्ध लड़े, और मुगलों के छक्के छुड़ाए. महाकवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता को देखते हुए ही यह पंक्तियां रची थीं.

    छत्ता तोरे राज में धक धक धरती होय।

    जित जित घोड़ा मुख करे उत उत फत्ते होय॥

(The above story first appeared on LatestLY on May 20, 2023 01:32 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).