क्या पश्चिम बंगाल में चुनाव राष्ट्रपति शासन के तहत कराए जाएंगे?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे पर हुए विवाद, राज्यपाल को बदला जाना और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन के बाद इन अटकलों को और बल मिला है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे पर हुए विवाद, राज्यपाल को बदला जाना और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन के बाद इन अटकलों को और बल मिला है.पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन का कोई लंबा इतिहास नहीं रहा है. इससे पहले 30 अप्रैल 1977 को केंद्र ने तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था, जो वाममोर्चा सरकार के शपथ ग्रहण तक 52 दिनों तक जारी रहा था.

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उस घटना के 49 साल बाद अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बंगाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल सात मई तक है. अगर तब तक चुनावी प्रक्रिया पूरी होकर नई सरकार का गठन नहीं हुआ तो राष्ट्रपति शासन लागू करना संवैधानिक मजबूरी बन जाएगी.

चुनाव आयोग का दौरा

चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने अपने तीन दिन के कोलकाता दौरे के दौरान तमाम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के अलावा पुलिस व प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में चुनावी तैयारियों का जायजा लिया था. अपने दौरे के आखिरी दिन 10 मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस में इस मुद्दे पर पूछे गए सवाल का कोई जवाब नहीं दिया.

उन्होंने इतना कहा कि दिल्ली लौटने के बाद कानून व व्यवस्था की स्थिति की गहन समीक्षा के आधार पर चुनाव की तारीख और मतदान के चरणों के बारे में फैसला किया जाएगा. इसके बाद अब निगाहें केंद्र को सौंपी जाने वाली आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हैं. इससे पहले चुनाव आयोग की टीम से मुलाकात के दौरान तृणमूल कांग्रेस के अलावा बाकी राजनीतिक दलों ने एक या अधिकतम दो चरणों में मतदान कराने की मांग की थी.

आखिर पश्चिम बंगाल में एसआईआर पर इतना विवाद क्यों?

मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि ईवीएम पर उम्मीदवारों की रंगीन तस्वीर लगी होगी. कोई उम्मीदवार अगर चाहे, तो मतदान के सात दिनों के भीतर ईवीएम की जांच करा सकेगा. उनके मुताबिक, पारदर्शिता के लिहाज से हर मतदान केंद्र पर वेबकास्टिंग की व्यवस्था रहेगी. उन्होंने बताया कि किसी भी मतदान केंद्र पर 1,200 से ज्यादा वोटर नहीं होंगे.

लेकिन क्या चुनाव से पहले विचाराधीन करीब 60 लाख लोगों के दस्तावेजों की जांच का काम पूरा हो जाएगा? इस सवाल पर आयोग का कहना था कि अभी इसके लिए पर्याप्त समय है. हमारा मकसद शांतिपूर्ण चुनाव कराना है. इसके लिए तमाम जरूरी कदम उठाए जाएंगे.

राजनीतिक दलों और खासकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सबसे ज्यादा आशंकित है. आयोग को कोलकाता और आसपास के इलाकों में अपने दौरे के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा. उसे काले झंडे दिखाए गए और 'गो बैक' के नारे लगे. तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन के दौरान ज्ञानेश कुमार को 'लोकतंत्र का हत्यारा' बताने वाले पोस्टर-बैनर भी हाथों में ले रखे थे.

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मुख्य चुनाव आयुक्त ने पत्रकारों से कहा, "पुलिस और प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों ने चुनाव के हिंसा-मुक्त आयोजन का भरोसा दिया है. आयोग भी इसके लिए कृतसंकल्प है. लेकिन हाल के वर्षों में यह काम अब तक असंभव ही रहा है."

राज्यपाल बदलने से बढ़ी आशंका

ममता बनर्जी विपक्ष में रहने के दौरान बार-बार वाममोर्चा सरकार को बर्खास्त कर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग उठाती रही है. लेकिन अब उनकी सरकार के खिलाफ ही बीजेपी इसकी मांग कर रही है.

इन आशंकाओं को बल मिला अचानक राज्यपाल को बदलने से. सीवी आनंद बोस ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि को इस पद पर ले आया गया. अमूमन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बंगाल जैसे राज्य में राज्यपाल को अचानक बदलने की कोई मिसाल नहीं मिलती.

सीवी आनंद बोस की जगह आर.एन. रवि को राज्यपाल बनाने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सवाल किया है कि क्या केंद्र सरकार यहां राष्ट्रपति शासन लागू करने की योजना बना रही है? जिस राज्यपाल ने तमिलनाडु में इतनी समस्याएं पैदा की थीं, उनको बंगाल का जिम्मा क्यों सौंपा गया है? ममता ने धरना मंच से कहा कि राष्ट्रपति शासन लग जाए तो बढ़िया है. उनको कुछ आराम मिलेगा, उसके बाद वह आंदोलन के लिए सड़क पर उतरेंगी.

राष्ट्रपति के दौरे पर विवाद

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बीते सप्ताह सिलीगुड़ी के पास आदिवासियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करने बंगाल पहुंची थी. उन्होंने इंतजाम पर भारी नाराजगी जताई. उन्होंने कहा था कि ममता शायद किसी वजह से उसे नाराज हैं, इसलिए उनके साथ ही कोई मंत्री भी अगवानी के लिए नहीं पहुंचा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर अपनी पोस्ट में यह मुद्दा उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रपति के अपमान का आरोप लगाया.

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दूसरी ओर, ममता बनर्जी का कहना था कि राष्ट्रपति का दौरा एक निजी आयोजन के सिलसिले में था. बावजूद इसके सरकार ने प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन किया. सिलीगुड़ी के मेयर के अलावा तमाम वरिष्ठ अधिकारी उनकी अगवानी के लए मौजूद थे. उनकी दलील थी कि वह आम लोगों के हक के लिए धरने पर बैठी थीं. ऐसे में राष्ट्रपति की अगवानी के लिए कैसे जा सकती थीं. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री हर चुनाव से पहले बंगाल को निशाना बनाते हैं और राज्य का अपमान करते हैं.

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एसआईआर की प्रक्रिया

राज्य में बीते नवंबर से ही जारी एसआईआर की प्रक्रिया तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के लिए गले की फांस बन गई है. निर्धारित समय बीत जाने के बावजूद करीब 60 लाख लोगों के नाम विचाराधीन श्रेणी में हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बंगाल के अलावा झारखंड और ओडिशा के करीब 700 न्यायिक अधिकारी संबंधित वोटरों के दस्तावेजों की जांच के काम में लगे हुए हैं.

यह प्रक्रिया अब कलकत्ता हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही है. 10 मार्च तक महज 10.16 लाख लोगों के दस्तावेजों की ही जांच की जा सकी थी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बाकी लोगों के दस्तावेजों की जांच का काम पूरा नहीं होने की स्थिति में उनके नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल होंगे और उसके बिना चुनाव कराना कैसे संभव होगा. आयोग के सूत्रों का कहना है कि इस काम में करीब दो महीने लगने की उम्मीद है.

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एसआईआर के मुद्दे पर बीजेपी और चुनाव आयोग के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता में पांच दिनों तक धरना आयोजित किया. इसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के महासचिव सांसद अभिषेक बनर्जी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी शामिल रहे थे. 10 मार्च की रात यह धरना खत्म हुआ.

ममता का आरोप है कि एसआईआर के बहाने भाजपा और आयोग की मिलीभगत से वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की साजिश चल रही है. मुख्यमंत्री के तौर पर ममता इससे पहले वर्ष 2019 में कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त और अब तृणमूल के राज्यसभा सांसद राजीव कुमार के घर पर सीबीआई के छापे के दौरान इसी जगह धरने पर बैठी थीं.

निजी बातचीत में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता भी राष्ट्रपति शासन की आशंका जता रहे हैं. एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री बीते पांच दिनों तक कोलकाता में धरने पर बैठी रही हैं.

सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमने चुनाव आयोग को बता दिया है कि 60 लाख वोटरों का भविष्य अधर में रहते राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं है." वहीं, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमीक भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पार्टी सैद्धांतिक तौर पर धारा 356 के जरिए किसी निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने के खिलाफ है. लेकिन बंगाल के लोग ममता बनर्जी सरकार की बर्खास्तगी के पक्ष में हैं."

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव से पहले एसआईआर के तहत जिन करीब साठ लाख लोगों के नाम विचाराधीन हैं, उनके दस्तावेजों की जांच का काम पूरा हो सकेगा? और अगर नहीं, तो क्या उनके बिना चुनाव करवाया जाएगा या फिर इसमें होने वाली देरी के कारण चुनाव टाल कर राष्ट्रपति शासन की जमीन तैयार की जा रही है? इस सवाल का जवाब अगले कुछ दिनों में मिलने की संभावना है.

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