Delhi Pollution: दमघोंटू हवा से कब मिलेगी आज़ादी? जानिए दिल्ली के प्रदूषण का परमानेंट इलाज और सरकार का नया ब्लूप्रिंट
हर साल सर्दियों की दस्तक के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली की हवा जहरीली हो जाती है. 'गैस चैंबर' बनते शहर की तस्वीरें अब आम हो चुकी हैं, लेकिन इस बार चर्चा समस्याओं से आगे बढ़कर समाधानों पर हो रही है. क्या दिल्ली कभी लंदन या बीजिंग की तरह साफ हवा में सांस ले पाएगी?
Delhi Pollution: हर साल सर्दियों की दस्तक के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली की हवा जहरीली हो जाती है. 'गैस चैंबर' बनते शहर की तस्वीरें अब आम हो चुकी हैं, लेकिन इस बार चर्चा समस्याओं से आगे बढ़कर समाधानों पर हो रही है. क्या दिल्ली कभी लंदन या बीजिंग की तरह साफ हवा में सांस ले पाएगी? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सरकार, नीति-निर्माता और पर्यावरण विशेषज्ञ एक साथ आए हैं. हाल ही में पेश किया गया 'समर एक्शन प्लान' और दीर्घकालिक रणनीतियां यह संकेत दे रही हैं कि अब केवल फौरी राहत नहीं, बल्कि बीमारी की जड़ पर प्रहार करने की तैयारी है. मुंबई महापालिका चुनाव की रणभूमि में महायुति का सीट बंटवारा, अजित पवार गुट पर अटका पेच, जानिए क्या हैं सीटों का समीकरण
सरकार का 'मास्टरप्लान 2025': तकनीक और सख्ती का मेल
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए अब तक का सबसे व्यापक '25-सूत्रीय एक्शन प्लान' तैयार किया है, जो पुराने तरीकों से काफी अलग है. इस योजना में तकनीक को सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है. सरकार ने आईआईटी कानपुर के साथ मिलकर 'क्लाउड सीडिंग' यानी कृत्रिम बारिश को एक आपातकालीन उपाय के तौर पर तैयार रखा है, ताकि प्रदूषण का स्तर खतरनाक होते ही हवा को धोया जा सके. इसके अलावा, सड़कों की धूल प्रदूषण का एक बड़ा कारण है. इसको नियंत्रित करने के लिए एंटी-स्मॉग गन्स और ड्रोन से पानी के छिड़काव को अनिवार्य कर दिया गया है. परिवहन के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव किए जा रहे हैं; 5,000 नई इलेक्ट्रिक बसों को बेड़े में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि निजी वाहनों के धुएं को कम किया जा सके.
बीजिंग मॉडल: पड़ोसी से मिली बड़ी सीख
जब बात प्रदूषण से जंग की होती है, तो अक्सर चीन की राजधानी बीजिंग का उदाहरण दिया जाता है. एक समय 'दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी' कहा जाने वाला बीजिंग आज साफ हवा का आनंद ले रहा है। चीनी दूतावास द्वारा साझा किए गए अनुभवों से दिल्ली ने यह सीखा है कि प्रदूषण को केवल एक शहर की समस्या मानना गलत है. बीजिंग ने अपने आसपास के औद्योगिक प्रांतों के साथ मिलकर काम किया और प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को सख्ती से शहर के बाहर शिफ्ट किया. दिल्ली के लिए भी सबक यही है कि जब तक एनसीआर (NCR) के सभी राज्य हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश मिलकर एक सख्त पालिसी नहीं अपनाते, तब तक दिल्ली की हवा साफ नहीं हो सकती.
'एयरशेड मैनेजमेंट': हवा सरहदों को नहीं मानती
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली का प्रदूषण एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक भौगोलिक समस्या है. हवा राज्यों की राजनीतिक सीमाएं नहीं देखती; पंजाब में जलती पराली का धुआं और राजस्थान की धूल हवा के बहाव के साथ दिल्ली पहुंचती है. इसलिए, विशेषज्ञ अब 'एयरशेड मैनेजमेंट' (Airshed Management) की वकालत कर रहे हैं. इसका मतलब है कि पूरे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों को एक वायु-क्षेत्र मानकर नीतियां बनाई जाएं. केवल दिल्ली में पाबंदियां लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक समान उत्सर्जन मानक (Emission Standards) लागू करने होंगे, तभी इस समस्या का स्थाई समाधान निकलेगा.
जन-भागीदारी: आपके हाथ में बदलाव की चाबी
सरकार और प्रशासन के प्रयासों के बीच, आम नागरिक की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता. 'एनवायरनमेंट दूत' जैसे कार्यक्रमों के जरिए सरकार अब जनता को इस लड़ाई का सिपाही बना रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बदलाव, जैसे रेड लाइट पर गाड़ी बंद करना, खुले में कूड़ा न जलाना और निर्माण कार्यों के दौरान धूल उड़ने से रोकना बड़े परिणाम ला सकते हैं. प्रदूषण के खिलाफ यह लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो इस हवा में सांस ले रहा है. उम्मीद है कि तकनीक, इच्छाशक्ति और जन-सहयोग का यह नया संगम आने वाले वर्षों में दिल्ली को फिर से सांस लेने लायक बना देगा.