Posters Against Akhilesh Yadav: यूपी में पोस्टर वॉर, लखनऊ की सड़कों पर अखिलेश यादव के खिलाफ लगे होर्डिंग्स, सपा शासन की तुलना 'ल्यारी राज' से की गई; VIDEO
(Photo Credits ANI)

 Posters Against Akhilesh Yadav: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बार फिर राजनीतिक पोस्टर वॉर तेज हो गई है. मंगलवार, 7 अप्रैल 2026 को शहर के प्रमुख चौराहों और मुख्यमंत्री आवास के आसपास समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव के खिलाफ विवादित पोस्टर देखे गए. ये पोस्टर 'यूथ अगेंस्ट माफिया' नामक संगठन की ओर से लगाए गए हैं, जिनमें सपा के शासनकाल पर तीखे हमले किए गए हैं.

 'ल्यारी राज' से की गई सपा शासन की तुलना

इन पोस्टरों में हालिया रिलीज फिल्म 'धुरंधर 2' का संदर्भ देते हुए अखिलेश यादव के पिछले कार्यकाल की तुलना 'ल्यारी राज' से की गई है. पोस्टर के एक तरफ अखिलेश यादव की तस्वीर है, जिसके नीचे मुजफ्फरनगर, मेरठ और शामली दंगों का जिक्र किया गया है. वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ माफिया अतीक और मुख्तार के खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण दिया गया है. यह भी पढ़े:  VIDEO: वक्फ बिल को लेकर RJD और JDU में पोस्टर वॉर, RSS की ड्रेस में नजर आए CM नीतीश कुमार!

'जीन जेड' (Gen Z) को संदेश देने की कोशिश

संगठन 'यूथ अगेंस्ट माफिया' के महासचिव अभिनव तिवारी ने इन पोस्टरों के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट किया है. उन्होंने कहा कि वे इन पोस्टरों के माध्यम से नई पीढ़ी (Gen Z) के बीच जागरूकता पैदा करना चाहते हैं.

लखनऊ में अखिलेश के खिलाफ लगे पोस्टर

राजनीतिक गलियारों में गरमाई चर्चा

विधानसभा चुनावों से पहले शुरू हुई इस पोस्टर बाजी ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है. पोस्टरों में एक तरफ अखिलेश यादव को नकारात्मक छवि में दिखाया गया है, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ को 'कन्या पूजन' करते हुए एक सशक्त मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया

हालांकि इन पोस्टरों को लेकर अभी सपा की ओर से आधिकारिक बयान आना बाकी है, लेकिन पार्टी समर्थकों ने इसे सत्ता पक्ष की 'प्रोपेगेंडा' राजनीति करार दिया है. पुलिस ने सुरक्षा और कानून व्यवस्था को देखते हुए कई जगहों से इन पोस्टरों को हटाना शुरू कर दिया है.

उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल के बीच इस तरह की पोस्टर वॉर यह दर्शाती है कि आगामी महीनों में कानून व्यवस्था और पिछला शासनकाल राजनीतिक दलों के बीच बहस का मुख्य मुद्दा बना रहेगा.