ईरान युद्ध को गैरजरूरी मानने वाले अमेरिका के एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दिया. ईरान युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को एक के बाद एक झटके दे रहा है.अमेरिका के नेशनल काउंटरटेरेरिज्म सेंटर के प्रमुख पद से जो केंट ने इस्तीफा दे दिया है. सोशल मीडिया पर इसका जिक्र करते हुए केंट ने लिखा, "ईरान में जारी युद्ध का समर्थन, मैं अपनी सही चेतना से नहीं कर सकता. ईरान, हमारे देश के लिए कोई फौरी खतरा नहीं था, और यह स्पष्ट है कि हमने यह युद्ध इस्राएल और उसकी ताकतवर लॉबी के दबाव में शुरू किया."
45 साल के जो केंट, ट्रंप प्रशासन में ईरान युद्ध पर इस्तीफा देने वाले पहले अधिकारी हैं. अमेरिका ने इस्राएल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमले शुरू किए. तब से ईरान में युद्ध जारी है और तेहरान भी पलटवार कर रहा है. युद्ध खाड़ी के सभी देशों तक फैल चुका है. अमेरिका और इस्राएल के हमलों में अपने सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई और सुरक्षा प्रमुखी अली लारीजानी को खोने के बाद तेहरान, पूरी तरह बदला लेने का एलान कर चुका है.
ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खमेनेई कौन हैं?
कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय युद्ध कानून के तहत, ईरान पर हमला करने के लिए यह साबित करना जरूरी था कि तेहरान अमेरिका के लिए फौरी खतरा बन चुका है.
ट्रंप प्रशासन का जवाब
अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय, द व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कारोलिन लेविट ने केंट के पत्र में लिखी गई बातों को "झूठे दावे" करार दिया है. लेविट ने कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ और सटीक ढंग से कहा कि, उनके पास ऐसे मजबूत और अकाट्य सबूत हैं कि ईरान पहले अमेरिका पर हमला करेगा. ये सबूत कई स्रोतों और फैक्टर्स से जुटाए गए."
कैरोलिन लेविट ने जितनी दृढ़ता से यह दावा किया, उसे विश्वसनीय बनाने के लिए उन्होंने कोई सबूत पेश नहीं किया. तीसरे हफ्ते में दाखिल हो चुके ईरान युद्ध पर अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके मंत्री खुद कई तरह के बयान दे रहे हैं. सारे बयानों को मिलाने पर एक असमंजस और विरोधाभासी प्रशासन की छवि उभर रही है.
अमेरिका की विपक्षी डेमोक्रैटिक पार्टी के वरिष्ठ सांसद मार्क वॉर्नर, जो केंट के प्रमुख आलोचक रहे हैं. वह, केंट को काउंटरटेरिरिज्म सेंटर का हेड बनाने का विरोध भी कर चुके हैं. अब केंट के इस्तीफे के बाद वॉर्नर ने कहा, "लेकिन इस वक्त, वह (केंट) सही हैं. इसका कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है कि ईरान से फौरी खतरा था, जिसके आधार पर हड़बड़ी में अमेरिका के एक और युद्ध में जाने को सही ठहराया जाए."
केंट की बॉस तुलसी गबार्ड रही हैं. गबार्ड नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल की प्रमुख हैं. केंट के इस्तीफे के बाद गबार्ड ने ट्रंप का बचाव किया है. हालांकि गबार्ड ने भी बिना सबूत पेश किए यह दावा किया है कि ईरान अमेरिका के लिए फौरी खतरा था.
ईरान युद्ध का क्या मकसद?
अमेरिका और उसके साझेदार देशों के बीच यह सवाल अब भी अनसुलझा बना हुआ है. ईरान युद्ध के पीछे इस्राएल का मसकद साफ है. वह तेहरान को इतना कमजोर कर देना चाहता है कि ईरान और उसके हथियारबंद गुट निकट भविष्य में इस्राएल के लिए किसी भी तरह का खतरा ना बनें.
हालांकि अमेरिका, इस युद्ध से क्या हासिल करना चाहता है, यह स्पष्ट नहीं है. सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत जैसे देश अमेरिका के करीबी साझेदार हैं. लेकिन उनके लगातार मना करने के बावजूद, ट्रंप ने तेहरान पर हमला करने का आदेश दिया. हमले तब किए गए जब ईरान, अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा था और एलान कर चुका था कि वह परमाणु हथियार कभी नहीं बनाएगा. 2025 में ट्रंप को निजी बोइंग विमान भेंट करने वाली कतर सरकार के कुछ मंत्री तो अब ईरान युद्ध की खुलकर आलोचना भी करने लगे हैं.
ईरान युद्ध सऊदी अरब, ओमान, बहरीन, यूएई, कतर और कुवैत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को भी कमजोर कर रहा है. दशकों से खाड़ी के ये अमीर देश कोशिश कर रहे थे कि दुनिया, उन्हें निवेश और कारोबार की पंसदीदा जगह के रूप में देखे. ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस कोशिश पर करारी चोट की है. अमेरिका की सुरक्षा के भरोसे बैठे इन देशों को अब कुछ हद तक वॉशिंगटन की सीमाएं और मंशाएं भी नजर आने लगी हैं.













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