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दिल्ली सरकार अपने खर्च पर करेगी 700 हेक्टेयर जमीन पर घोल का छिड़काव, किसानों पर नही पड़ेगा आर्थिक बोझ- सीएम अरविंद केजरीवाल

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज साउथ-वेस्ट दिल्ली स्थित खरखरी नाहर गांव में पराली को गलाने के लिए बनाए गए डी-कंपोजर घोल निर्माण केंद्र का स्थलीय निरीक्षण किया और घोल बनाने की प्रक्रिया को समझा. दिल्ली सरकार, पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूटी की निगरानी में पराली के डंठल को खेत में गला कर खाद बनाने के लिए इस घोल का निर्माण करा रही है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार इस घोल का छिड़काव करीब 700 हेक्टेयर जमीन पर अपने खर्चे पर करेगी और किसानों पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा.

दिल्ली सरकार अपने खर्च पर करेगी 700 हेक्टेयर जमीन पर घोल का छिड़काव, किसानों पर नही पड़ेगा आर्थिक बोझ- सीएम अरविंद केजरीवाल
डी-कंपोजर घोल निर्माण केंद्र का निरीक्षण करते हुए सीएम केजरीवाल (Photo Credits-File Image)

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज साउथ-वेस्ट दिल्ली स्थित खरखरी नाहर गांव में पराली को गलाने के लिए बनाए गए डी-कंपोजर घोल निर्माण केंद्र का स्थलीय निरीक्षण किया और घोल बनाने की प्रक्रिया को समझा. दिल्ली सरकार, पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूटी की निगरानी में पराली के डंठल को खेत में गला कर खाद बनाने के लिए इस घोल का निर्माण करा रही है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार इस घोल का छिड़काव करीब 700 हेक्टेयर जमीन पर अपने खर्चे पर करेगी और किसानों पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा.हालांकि किसानों को अपने खेत में इस घोल के छिड़काव के लिए अपनी सहमति देनी होगी. अगले सात दिन के बाद यह घोल बन कर तैयार हो जाएगा और 11 अक्टूबर से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घोल का छिड़काव किया जाएगा. यह प्रयोग सफल होता है, तो अन्य राज्यों के किसानों को भी पराली का एक समाधान मिल जाएगा. वहीं, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि हम दिल्ली को रोल मॉडल बनाना चाहते हैं, ताकि किसी भी सरकार को पराली को लेकर कोई बहाना बनाने का मौका न मिले और इसे जलाने की जगह कम खर्च में गलाने के बायो सिस्टम का उपयोग पूरे देश में हो सके.

साउथ-वेस्ट दिल्ली स्थित खरखरी नाहर गांव में पराली को गलाने के लिए बनाए गए डी-कंपोजर घोल निर्माण केंद्र का स्थलीय निरीक्षण करने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हर साल जब पुरानी फसल काटने के बाद किसान को नई फसल की बोआई करनी होती है, तो किसान के खेत में पराली बच जाती है. जो किसान गैर बासमती चावल उगाते हैं, उनके खेत में यह पराली के मोटे-मोटे डंठल बच जाते हैं. अभी तक किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अगली फसल की बोआई के लिए उनके पास समय कम होता है और उस पराली से वो निजात कैसे पाएं? उसके लिए पराली एक समस्या बन रही थी. किसान उस पराली को जलाता था. पराली को जलाने की वजह से उस जमीन के अंदर फसल के लिए फायदेमंद बैक्ट्रिया मर जाया करते थे और पराली के जलाने से निकलने वाले धुंआ से उस किसान और पूरे गांव के लोगों को प्रदूषण से परेशानी होती थी. साथ ही, वह धुंआ दिल्ली समेत उत्तर भारत में फैल जाता था, जिसके चलते सभी लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता था. सभी लोग प्रदूषण से पीड़ित होते थे. यह भी पढ़ें-नई दिल्ली: मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने छात्रों को दिया डेंगू खत्म करने का होमवर्क, घर और आस-पास की जगहों पर इकट्ठा साफ पानी बदलने के लिए किया प्रोत्साहित

सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट ने पराली को निस्तारित करने का समाधान निकाला है. पूसा द्वारा इजात किया गया समाधान बहुत ही सस्ता और सरल है। पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट ने कुछ कैप्सूल बनाए हैं. इस कैप्सूल के जरिए घोल बनाया जाता है. इस घोल को अगर खेतों में खड़े पराली के डंठल पर छिड़क दिया जाए, तो वह डंठल गल जाता है और वह गल करके खाद में बदल जाता है. डंठल से बनी खाद से उस जमीन की उर्वरक क्षमता में वृद्धि होती है, जिसके बाद किसान को अपने खेत में खाद कम देना पड़ता है. इस तकनीक के प्रयोग के बाद किसान को फसल उगाने में लागत कम लगेगी, किसान की फसल की पैदावार अधिक होगी और किसान को खेतों में खड़ी फसल जलानी नहीं पड़ेगी. इसकी वजह से खेत में उपयोगी वैक्ट्रियां भी नहीं मरेंगे और लोगों को प्रदुषण से भी मुक्ति मिलेगी.

सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट पिछले तीन-चार साल से पराली की समस्या के समाधान को लेकर रिसर्च कर रहा था। आज दिल्ली में लगभग 700 हेक्टेयर जमीन है, जिस पर गैर बासमती धान की फैसल उगाई जाती है और वहां पर पराली की समस्या है। दिल्ली सरकार पूरे 700 हेक्टेयर जमीन पर अपने खर्चे पर इस घोल का छिड़काव करेगी, इस पर किसानों पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा, किसानों को सिर्फ अपने खेत में घोल के छिड़काव के लिए अपनी सहमति देनी होगी। किसान की सहमति के बाद दिल्ली सरकार घोल भी देगी और उसका हम लोग छिड़काव भी कर रहे हैं. दिल्ली सरकार ने आज से पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट की निगरानी में घोल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. साउथ वेस्ट दिल्ली में स्थित खरखरी नाहर गांव में पराली गलाने के लिए डी-कंपोजर घोल निर्माण केंद्र स्थापित किया गया है। घोल तैयार करने की प्रक्रिया सात दिनों तक चलेगी। इसमें गुड़ और बेसन डाल कर चार दिनों तक रखा जाता है. सात दिन के बाद यह घोल बन कर तैयार हो जाएगा और इसके बाद 11 अक्टूबर से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में हम लोग घोल का छिड़काव शुरू करेंगे.

सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हमें पूरी उम्मीद है कि यह प्रयोग सफल होगा और अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो आसपास के राज्यों के किसानों को भी पराली का एक समाधान देगा. यह इतना सस्ता है कि दिल्ली के अंदर 700 हेक्टेयर जमीन पर घोल बनाना, छिड़काव करना, इसका ट्रांसपोर्टेशन आदि मिला कर इस पर केवल 20 लाख रुपए का खर्च आ रहा है. यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो हम किसानों के खेत में घोल का छिड़काव हर साल करेंगे.

वहीं, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि दिल्ली के अंदर पराली का धुंआ बहुत कम पैदा होता है। दिल्ली के अंदर पराली बहुत कम मात्रा में जलाई जाती है, लेकिन पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर पराली जलाई जाती है और यह दिल्ली के प्रदूषण को करीब 45 प्रतिशत तक प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि दिल्ली के अंदर पूसा संस्थान के सहयोग से घोल तैयार कर रहे हैं. हम दिल्ली को एक रोल मॉडल के रूप में खड़ा कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि एक ऐसा रोल मॉडल खड़ा हो जाए जिससे किसी भी सरकार को पराली जलने से रोकने को लेकर कोई बहाना बनाने का मौका न मिले और इस पराली जलाने की जगह कम खर्च में पराली गलाने के बायो सिस्टम का उपयोग पूरे देश में हो, ताकि दिल्ली के लोगों को पराली जलने से सर्दियों में होने वाली दिक्कत से मुक्ति मिल सके.

एक सवाल का जवाब देते हुए पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि हम पराली के समाधान को लेकर लगातार प्रयास कर रहे हैं और इसीलिए हम इसका प्रयोग करके परिणाम सामने लाना चाहते हैं कि पराली को जलाने के अलावा भी दूसरा विकल्प है. मेरे ख्याल से पराली की समस्या के समाधान को लेकर जो भी लोग गंभीर हैं, उन सभी लोगों को इस विकल्प का उपयोग करना चाहिए. पूसा द्वारा विकसित इन नई तकनीक का पड़ोसी राज्यों में इस्तेमाल के संबंध में पर्यावरण मंत्री ने कहा कि यह उन राज्यों की इच्छाशक्ति के उपर निर्भर करता है. हमने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के साथ हुई बैठक के दौरान भी कहा था, जिसमें आसपास के राज्यों के मंत्री भी शामिल थे. हमने कहा था कि दिल्ली के अंदर अगर हम केंद्रित व्यवस्था करके इसे लागू कर पा रहे हैं, तो वो भी कर सकते हैं, यह उन पर निर्भर करता है. उन्होंने कहा कि घोल बनाने का काम शुरू हो गया है. दिल्ली के लगभग 1200 किसानों ने इस तकनीक को अपने खेत में इस्तेमाल करने की इच्छा जताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया है. हम जल्द ही उनके खेतों में इस घोल का छिड़काव शुरू करेंगे.

(The above story first appeared on LatestLY on Oct 06, 2020 07:51 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).