Maternity Benefit Act: एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि मैटरनिटी लीव (Maternity Leave) केवल नौकरी में मिलने वाला एक लाभ नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रजनन अधिकारों का एक मौलिक हिस्सा है. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी महिला को उसकी वैवाहिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर मैटरनिटी लीव से वंचित नहीं किया जा सकता.
तमिलनाडु की एक महिला सरकारी कर्मचारी की अर्जी पर कोर्ट ने यह अहम आदेश पारित किया, जिसने फिर शादी पुनर्विवाह के बाद शिशु को जन्म दिया था. ऐसे में उसके अधिकारियों ने उसे मैटरनिटी लीव से देने से इनकार कर दिया. इसके बाद ये महिला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई.ये भी पढ़े:Odisha Surrogacy Maternity Leave: सरोगेसी से मां बनाने वाली महिला कर्मचारियों को भी मिलेगा 180 दिनों का मैटरनिटी लीव, ओडिशा सरकार का बड़ा फैसला
तमिलनाडु की शिक्षिका को मातृत्व अवकाश से किया गया था वंचित
यह फैसला तमिलनाडु की एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका की याचिका पर आया, जिसे दूसरी शादी से हुए पहले बच्चे के जन्म के बाद मैटरनिटी लीव देने से इनकार कर दिया गया था. राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि मातृत्व लाभ सिर्फ पहले दो बच्चों तक सीमित हैं.
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने अपनी पहली शादी के दौरान दो बच्चों को जन्म दिया था, लेकिन उस समय वह नौकरी में नहीं थी, इसलिए उसने कोई मैटरनिटी लीव नहीं ली थी. अब, दूसरी शादी के बाद जब वह कार्यरत है और एक बच्चे को जन्म दिया है, तो उसने मैटरनिटी लीव की मांग की.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति अभय एस. ओक और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी संस्था , चाहे वह सरकारी हो या निजी, किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह महिला के व्यक्तिगत या वैवाहिक इतिहास के आधार पर उसे मैटरनिटी से वंचित करे.
कोर्ट ने माना कि मातृत्व अवकाश महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता और स्वास्थ्य का मूलभूत हिस्सा है, और इस अधिकार को केवल बच्चों की संख्या के आधार पर सीमित करना, विशेष रूप से तब जब पूर्व में लीव नहीं ली गई हो, महिला के अधिकारों का उल्लंघन है. मातृत्व लाभ अधिनियम 2017 के तहत अधिकार. मातृत्व लाभ अधिनियम, 2017 के तहत, कार्यरत महिलाओं को 26 सप्ताह (6.5 महीने) तक पेड मैटरनिटी का अधिकार है. वहीं, दत्तक माताओं को 12 सप्ताह की लीव का प्रावधान है.













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