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What is Passive Euthanasia? पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु क्या है? जानें भारत में इसके नियम और यह प्रक्रिया कैसे काम करती है

पैसिव यूथेनेशिया या निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ जीवन रक्षक प्रणाली को हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना है. भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए कड़े दिशा-निर्देश तय किए हैं, जिसमें मेडिकल बोर्ड की अनुमति और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार शामिल है.

What is Passive Euthanasia? पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु क्या है? जानें भारत में इसके नियम और यह प्रक्रिया कैसे काम करती है
(Photo Credits News 18 UP)

What is Passive Euthanasia? भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में 'हरीश राणा केस' में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति देकर एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की है. इस फैसले के बाद देश में एक बार फिर इस गंभीर और संवेदनशील विषय पर चर्चा तेज हो गई है. साधारण शब्दों में कहें तो पैसिव यूथेनेशिया वह प्रक्रिया है जिसमें किसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति का इलाज रोक दिया जाता है ताकि वह गरिमा के साथ प्राकृतिक मौत मर सके.

एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में अंतर

दुनिया भर में इच्छामृत्यु को दो श्रेणियों में बांटा जाता है. 'एक्टिव यूथेनेशिया' में डॉक्टर मरीज को घातक इंजेक्शन या दवा देकर जानबूझकर मृत्यु की प्रक्रिया को तेज करते हैं, जो भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है. इसके विपरीत, 'पैसिव यूथेनेशिया' में केवल उन बाहरी मशीनों या दवाओं (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा दिया जाता है जिनके बिना मरीज जीवित नहीं रह सकता. इसमें डॉक्टर मरीज को मारते नहीं हैं, बल्कि उसे बचाने की कृत्रिम कोशिशें बंद कर देते हैं.

भारत में कानूनी मान्यता और 'लिविंग विल'

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के 'कॉमन कॉज' मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि संविधान का 'अनुच्छेद 21' न केवल सम्मान के साथ जीने का, बल्कि सम्मान के साथ मरने का भी अधिकार देता है. कोर्ट ने 'लिविंग विल' (Living Will) की अवधारणा को भी मंजूरी दी है. इसके तहत कोई भी स्वस्थ व्यक्ति पहले से लिखित दस्तावेज तैयार कर सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां से लौटना असंभव हो, तो उसे मशीनों के सहारे जीवित न रखा जाए.

कैसे शुरू होती है इच्छामृत्यु की प्रक्रिया?

2023 के संशोधित नियमों के अनुसार, अब यह प्रक्रिया पहले के मुकाबले थोड़ी सरल लेकिन सुरक्षित है. इसकी मुख्य चरणबद्ध प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • प्राइमरी मेडिकल बोर्ड: सबसे पहले अस्पताल के तीन विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की स्थिति की जांच करता है. इसमें कम से कम 5 साल का अनुभव रखने वाले डॉक्टर शामिल होने चाहिए.
  • सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड: यदि पहला बोर्ड सहमत होता है, तो अस्पताल एक दूसरा स्वतंत्र बोर्ड गठित करता है, जिसमें जिला स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा नामित एक सदस्य होता है.
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचना: दोनों बोर्डों की सहमति के बाद अस्पताल को संबंधित क्षेत्र के मजिस्ट्रेट को सूचित करना होता है.
  • 30 दिनों का समय: आमतौर पर परिवार को सोचने के लिए समय दिया जाता है, हालांकि 'हरीश राणा केस' जैसे असाधारण मामलों में कोर्ट इसे माफ भी कर सकता है.

गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

अदालत का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क ने काम करना पूरी तरह बंद कर दिया है (Permanent Vegetative State) और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, तो उसे अंतहीन पीड़ा में रखना उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इच्छामृत्यु का उद्देश्य किसी का जीवन छीनना नहीं, बल्कि किसी के कष्टकारी अंत को गरिमा प्रदान करना है.

 

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 11, 2026 12:03 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).