Jay Pawar Enters Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा नाम जुड़ गया है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख नेता अजीत पवार के निधन के बाद अब उनके छोटे बेटे जय पवार ने सक्रिय राजनीति में कदम रख दिया है. उन्हें पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली एपेक्स कमेटी में शामिल किया गया है. Ajit Pawar Death: अजित पवार महाराष्ट्र का वह नाम, निधन के बाद 6 बार डिप्टी सीएम रहने वाले 'दादा' का मुख्यमंत्री बनने का सपना रह गया अधूरा
बताया जा रहा है कि जय पवार को अभी पार्टी में कोई विशेष जिम्मेदारी नहीं दी गई है, लेकिन उन्हें जल्द ही अहम भूमिका सौंपी जा सकती है. उनका नाम 10 मार्च को चुनाव आयोग को भेजे गए पत्र में शामिल किया गया था, जबकि 26 फरवरी को हुई पार्टी की राष्ट्रीय बैठक में उन्हें इस समिति में जगह दी गई थी.
अजीत पवार के निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. अब उनके बेटे जय पवार की एंट्री को पार्टी में नई पीढ़ी के नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है.
पारिवारिक राजनीतिक विरासत मजबूत
पवार परिवार की राजनीति में पहले से ही मजबूत पकड़ रही है. शरद पवार के बाद अजीत पवार ने राजनीति में अपनी पहचान बनाई. वहीं, सुप्रिया सुले, रोहित पवार और पार्थ पवार भी सक्रिय राजनीति में हैं. अब जय पवार के शामिल होने से यह राजनीतिक विरासत और आगे बढ़ती नजर आ रही है.
पार्थ पवार हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए हैं और 6 अप्रैल के बाद शपथ लेंगे. इससे पहले उन्होंने 2019 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.
NCP की शीर्ष समिति में बड़े नाम शामिल
NCP की एपेक्स कमेटी पार्टी की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था मानी जाती है. इसमें सुनेत्रा पवार के अलावा प्रफुल्ल पटेल (राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष), सुनील तटकरे (राज्य अध्यक्ष), छगन भुजबल, दिलीप वालसे-पाटिल, चेतन तुपे, शेखर निकम, सरोज अहिरे, सना मलिक समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं.
पार्टी के मुख्य प्रवक्ता आनंद परांजपे ने कहा कि जय पवार युवा नेता हैं और उनके पास मजबूत राजनीतिक विरासत है. उन्हें जल्द ही पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी.
पार्थ पवार का बयान
इस बीच पार्थ पवार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर चल रही अटकलों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे को लेकर जो खबरें चल रही हैं, वे पूरी तरह निराधार हैं और वरिष्ठ नेताओं को विवादों में घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण है.












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