Jammu-Kashmir: कश्मीर में अब अलगाववाद फैलाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे सरकारी कर्मचारी
सोशल मीडिया (Photo Credits: File Photo)

नई दिल्ली: जम्मू एवं कश्मीर (Jammu-Kashmir) सरकार के 5 लाख से अधिक कर्मचारी अब अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया (Social Media) का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने अंतत: न केवल राजनीति (Politics) करने और आतंकियों (Terrorists) के आह्वान पर बंद का पालन करने के लिए अपनी असीम स्वतंत्रता खो दी है, बल्कि वे अब केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territory) को भारत (India) संघ से अलग करने की भी मांग को भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं उठा पा रहे हैं. Jammu and Kashmir: कुपवाड़ा में एक घर में विस्फोट में किशोरी की मौत, छह घायल

पिछले 13 महीनों में, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कई कानूनों और नियमों को लागू किया है और नए आदेश पेश किए हैं, जिससे अलगाववादियों और आतंकवादियों के आख्यानों को बढ़ावा देने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकारी खजाने से अपना वेतन निकालना जारी रखना मुश्किल हो गया है.

उच्च पदस्थ नौकरशाही सूत्रों का कहना है कि मुख्य रूप से ऐसे लोक सेवकों की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों का कारण यह है कि वह पिछले कुछ दिनों से आजादी नैरेटिव को बढ़ावा देने और भारत को बदनाम करने के एजेंडे में शामिल रहे हैं. यह कर्मचारी ऐसे सोशल मीडिया अभियानों में सक्रिय रहते हैं, जो कि भारत की संप्रभुता को अखंडता को चोट पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं.

एक वरिष्ठ नौकरशाही सूत्र ने कहा कि तथाकथित आजादी की मांग करते हुए अपनाया जाने वाला तरीका 1990-99 के समय की अपेक्षा अब बदल गया है. अब देखा जा रहा है कि सोशल मीडिया अलगाववाद का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है और इस एजेंडे में अब सरकार के स्वयं के ऐसे कर्मचारी भी हैं, जो कि भारतीय खजाने से वेतन प्राप्त करते हैं और भारत की अखंडता को नुकसान पहुंचाने के काम में लिप्त हैं.

अधिकारी ने कहा, "जैसे ही हमने सरकारी कर्मचारियों और बेलगाम सोशल मीडिया के इस घातक संयोजन पर शिकंजा कस दिया, हमें वांछित परिणाम मिले हैं."

वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि तथाकथित आजादी को बढ़ावा देने वाले अधिकांश सरकारी कर्मचारियों ने या तो फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने अकाउंट्स को समाप्त कर दिया है या अपने आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट और ट्वीट को हटा दिया है.

अधिकारियों में से एक ने दावा करते हुए कहा, "उनमें से कई ने अभी भी अपने अकाउंट्स को जारी रखा हुआ है. वे इंटरनेट पर कश्मीर से संबंधित ट्रैफिक का उपयोग करते हैं, लेकिन अपनी पिछली आदतों के विपरीत वे संवेदनशील और आपत्तिजनक टिप्पणी करने, ट्रोल करने, गाली देने और उन राष्ट्रवादियों और अन्य लोगों को धमकी देने से बचते हैं, जो पाकिस्तानी एजेंडे को मानने से इनकार करते हैं."

हालांकि अब एलजी सिन्हा के प्रशासन ने नियमों में भारी बदलाव किया है और सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया को आसान बनाया है. आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) द्वारा आतंकी समर्थक के रूप में रिपोर्ट किए गए सरकारी कर्मचारियों को अब पासपोर्ट जारी नहीं किए जाते हैं. अब पुलिस को निर्देश दिया गया है कि भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने वाले या आय के कानूनी स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने वाले किसी भी व्यक्ति को मंजूरी जारी न करें.

इस संबंध में बात करते हुए एक अधिकारी ने बताया, "यह प्रक्रिया लगभग 30 वर्षों तक सभी के लिए आसान थी. शीर्ष रैंकिंग के कई आतंकवादी 1990 के दशक में भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने में भी कामयाब रहते थे. वे पूरी दुनिया की यात्रा करते थे. अब कई जांच और संतुलन मौजूद हैं और ऐसे तत्वों के लिए धोखाधड़ी के माध्यम से भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करना आमतौर पर असंभव है."

एक अधिकारी ने कहा, "उनमें से कई ऐसे थे, जिन्होंने एक दिन भी ड्यूटी में शामिल हुए बिना घर पर ही मोटी तनख्वाह ली."

आतंकवाद और प्रतिवाद से निपटने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, हजारों सरकारी कर्मचारियों ने सक्रिय आतंकवादियों के रूप में काम किया, आतंकवादियों और अलगाववादियों के ओडब्ल्यूजी (ओवर-ग्राउंड वर्कर) ने अपनी सरकारी नौकरी बरकरार रखते हुए और मासिक वेतन लेते हुए, विशेष रूप से 1990 से 2010 तक घर पर ही आनंद लिया. उनमें से कई कथित तौर पर हत्या सहित गंभीर अपराधों में शामिल थे. कुछ मारे गए. कुछ ने सरेंडर कर दिया. कुछ को गिरफ्तार किया गया. लेकिन उनमें से कुछ को उनके कथित अपराधों के लिए मुकदमे का सामना करना पड़ा और शायद ही किसी को अदालत ने दोषी ठहराया हो. माना जाता है कि पिछले 32 वर्षों में सेवा से बर्खास्त किए गए लोगों की संख्या लगभग 1000-1200 है, जिनमें से ज्यादातर पुलिस विभाग से थे.

ज्ञात आतंकी पृष्ठभूमि वाले कई कर्मचारी अभी भी सरकारी सेवाओं में हैं-कुछ मध्यम श्रेणी के पदों पर हैं. एक आम धारणा यह है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों में पुलिस और सुरक्षा बलों को उनके खुले या गुप्त समर्थन के कारण सरकार ने उन पर अपनी आंखें बंद कर लीं.

हालांकि, मीडियाकर्मियों और आतंकवाद विश्लेषकों का मानना है कि लगातार सरकारों में मुख्यधारा के राजनेताओं ने विध्वंसक और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल लोक सेवकों के खिलाफ कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई को विफल करने में अक्सर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. देर से, कथित आतंकवादी कनेक्शन और विध्वंसक गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किए गए सरकारी अधिकारियों में से एक श्रीनगर नगर निगम में एक वरिष्ठ प्रशासनिक पद पर था.

एक नायब तहसीलदार, जिसे चालू वर्ष में बर्खास्त कर दिया गया था, ने कथित तौर पर पुलवामा में अपने शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में इम्प्रूव्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) संग्रहीत किया था.

यहां तक कि अगस्त 2020 से एलजी सिन्हा के कार्यकाल में सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या, जिन्हें 'डेडवुड' या 'संदिग्ध व्यक्ति' घोषित किया गया है और सार्वजनिक सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है, अभी भी 20 के करीब हैं. बर्खास्तगी ने एक मजबूत कार्रवाई का संदेश दिया है, जिससे अब ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है.