सस्ती लगने वाली EMI पड़ रही है महंगी, जेब से निकल रहे ज्यादा पैसे, समझिए गणित
Hidden Costs Of EMI

आजकल हर बड़ी खरीदारी को आसान बनाने के लिए ईएमआई (EMI) का विकल्प लगभग हर जगह उपलब्ध है. नई मोबाइल फोन से लेकर महंगी कार और फर्नीचर तक, छोटे-छोटे मासिक किस्तों में पेमेंट करने का विकल्प लोगों को आकर्षक लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं, कि यही सुविधा आपके जेब से ज्यादा पैसे निकलवा रही है? आइए समझते हैं, कि ईएमआई का असली खेल क्या है.

सस्ती लगने वाली ईएमआई का झांसा

जब किसी बड़ी रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जाता है, तो दिमाग को लगता है कि खरीदारी आसान और सस्ती है. यही वजह है, कि ईएमआई लोगों को उनकी असली बजट से ज्यादा खर्च करने के लिए उकसाती है.

ब्याज का खेल

मान लीजिए आपने 50,000 रुपये का मोबाइल खरीदा और 12 महीने की ईएमआई चुनी, जिस पर 8% ब्याज है. देखने में तो फोन 50 हज़ार का है, लेकिन ईएमआई चुकाते-चुकाते यह कीमत लगभग 54,000 रुपये तक पहुंच जाती है. यानी ब्याज और अन्य चार्जेज आपके खर्च को बढ़ा देते हैं.

नो-कॉस्ट ईएमआई का सच

अक्सर दुकानदार और ई-कॉमर्स कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए ‘नो-कॉस्ट ईएमआई’ (No-Cost EMI) का विकल्प दिखाती हैं. यह सुनने में तो बिल्कुल मुफ़्त लगता है, मानो आपको बिना किसी अतिरिक्त खर्च के किस्तों में सामान मिल रहा हो. लेकिन हकीकत इससे अलग होती है. असल में, कंपनियां उस प्रोडक्ट पर मिलने वाला डिस्काउंट या स्पेशल ऑफर हटा देती हैं और फिर वही कीमत किस्तों में वसूलती हैं. यानी ग्राहक को लगता है, कि उसने कोई अतिरिक्त रकम नहीं दी, जबकि सच्चाई यह है कि वह उतना ही भुगतान कर रहा होता है जितना फुल पेमेंट करने पर करता, बस इसे अलग-अलग महीनों में बांटकर चुकाना पड़ता है. यही कारण है कि ‘नो-कॉस्ट ईएमआई’ पूरी तरह से मुफ्त नहीं होती, बल्कि एक मार्केटिंग ट्रिक होती है.

लंबी अवधि, ज्यादा खर्च

अगर आप ईएमआई को 24 महीनों तक बढ़ा देते हैं, तो मासिक बोझ जरूर कम हो जाता है, लेकिन कुल भुगतान और बढ़ जाता है. यानी लंबे समय तक ईएमआई लेने का मतलब है, खरीदारी और महंगी हो जाना.

ईएमआई पर छुपे टैक्स

कई बार जब आप ईएमआई का विकल्प चुनते हैं, तो उस पर केवल ब्याज ही नहीं बल्कि अलग-अलग तरह की प्रोसेसिंग फीस भी जुड़ जाती है. इसके अलावा, इन ब्याज और फीस पर जीएसटी (GST) भी लगाया जाता है. नतीजा यह होता है, कि आपकी हर महीने चुकाई जाने वाली किस्त में छिपा हुआ टैक्स भी शामिल होता है. देखने में तो ईएमआई सिर्फ एक तय रकम लगती है, लेकिन असल में उसमें ब्याज और टैक्स दोनों का बोझ जुड़कर आपकी कुल लागत को और बढ़ा देता है.

पहले भुगतान पर पेनाल्टी

अगर आप सोचते हैं, कि बाद में पैसे आने पर ईएमआई को जल्दी खत्म कर देंगे, तो यह भी हमेशा आसान नहीं होता है. कई कंपनियां प्रीपेमेंट (Prepayment) और फोरक्लोज़र (Foreclosure) पर भारी चार्ज लगाती हैं.

छोटे-छोटे ईएमआई से बड़ा कर्ज

ईएमआई का सबसे बड़ा खतरा यह है, कि लोग एक साथ कई प्रोडक्ट ईएमआई पर ले लेते हैं. शुरुआत में सब आसान लगता है, लेकिन धीरे-धीरे ये छोटे-छोटे ईएमआई एक बड़ी मासिक जिम्मेदारी बन जाते हैं, जो आपकी बचत को खत्म कर देती है.

कैसे बचें ईएमआई के जाल से?

ईएमआई का विकल्प आज हर जगह आसानी से मिल जाता है, लेकिन इसे अपनाने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है.

  • हमेशा फुल पेमेंट और ईएमआई का तुलनात्मक हिसाब लगाएं, कई बार सीधे भुगतान करना ज्यादा सस्ता पड़ता है.
  • ईएमआई चुनते समय ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और जीएसटी जैसे छुपे हुए खर्चों पर खास नजर रखें.
  • कोशिश करें कि छोटी अवधि की ईएमआई चुनें, ताकि कुल भुगतान कम हो.
  • एक साथ कई ईएमआई लेने से बचें, वरना आपकी मासिक आय पर भारी बोझ पड़ सकता है.

आखिर में याद रखें, की ईएमआई बुरी चीज़ नहीं है, लेकिन यह आपको असली कीमत से ज्यादा ‘सस्ती किस्त’ पर फोकस करवा देती है. समझदारी इसी में है, कि खरीदारी से पहले ईएमआई की पूरी लागत को समझें और फिर फैसला लें. सही जानकारी और सोच-समझकर उठाया गया कदम आपकी जेब को हल्का नहीं, बल्कि स्मार्ट बनाएगा.