Digital Arrest Fraud: पिछले कुछ दिनों से ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) शब्द लगातार चर्चा में है. देशभर में कई लोग इसके जरिए लाखों–करोड़ों रुपये की ठगी का शिकार हो चुके हैं. हाल ही में नासिक में एक वरिष्ठ नागरिक से 6 करोड़ रुपये और मुंबई की एक महिला से 8 करोड़ रुपये की ठगी की गई. यह नया फ्रॉड का तरीका लोगों के बीच तेजी से फैल रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है - क्या पुलिस को वास्तव में ‘डिजिटल अरेस्ट’ करने का अधिकार है? आखिर यह डिजिटल अरेस्ट है क्या? ठग इस फ्रॉड को कैसे अंजाम देते हैं? अगर आप ऐसे किसी झांसे में आ जाएं तो क्या करना चाहिए? और साइबर पुलिस की गाइडलाइन में इसके बारे में क्या कहा गया है? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के सरल और सटीक जवाब.
क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’?
डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी शब्द नहीं है, यह एक ठगी का नया तरीका है जिसमें ठग वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम अधिकारी या जज बताकर डराते हैं और कहते हैं कि आपके खिलाफ गंभीर आरोप हैं, इसलिए आप कॉल नहीं काट सकते है. फिर इस डर का लाभ उठाकर वे आपसे पैसे ऐंठ लेते हैं. गृह मंत्रालय की आधिकारिक गाइडलाइन के अनुसार वीडियो कॉल के जरिए की जाने वाली ऐसी गिरफ्तारी पूरी तरह फर्जी और गैरकानूनी है.
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने भी साफ तौर पर स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है. इसका मतलब है, कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए लिखित आदेश, वॉरंट और शारीरिक हिरासत आवश्यक होती है. किसी भी स्थिति में वीडियो कॉल, व्हाट्सएप या ऑनलाइन माध्यम से गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है. ऐसी सभी कार्रवाइयाँ पूरी तरह फर्जी और गैरकानूनी हैं.
कैसे होता है ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड?
ठग अलग-अलग मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़कर लोगों में डर पैदा करते हैं. वे कहते हैं कि आपका पार्सल ड्रग्स के साथ पकड़ा गया है, आपका केवाईसी अपडेट नहीं है, आपके मोबाइल से अश्लील वीडियो वायरल हो गए हैं या आपके बैंक खाते से कोई बड़ा घोटाला हुआ है. फिर वे वीडियो कॉल कर के खुद को डीपफेक क्लिप, नकली आईडी कार्ड या किसी अधिकारी के रूप में पेश करते हैं और धमका कर खाते में जमानत या सुरक्षा राशी जमा करवाने को कहते हैं. वह अक्सर यूपीआई (UPI) या बैंक ट्रांसफर की मांग करते हैं. कई बार वे कहते हैं कि ‘कॉल मत काटो, फोन ऑन रखो और किसी से बात मत करो’ ताकि पीड़ित बाहर से मदद न माँग सके, इसी तरीक़े को आम बोलचाल में ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है.
अगर ऐसा कॉल आए तो तुरंत क्या करें?
- किसी भी संदिग्ध वीडियो कॉल या संदेश पर तुरंत कॉल काट दें. व्हाट्सएप, स्काइप या टेलीग्राम पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है.
- कभी भी ओटीपी (OTP), बैंक डिटेल या पैसे न दें. फ़ोन नंबर ब्लॉक कर दें और कॉल/स्क्रीन का रिकॉर्ड व स्क्रीनशॉट सबूत के रूप में सुरक्षित रखें.
- ऐसा होने पर तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन ‘1930’ पर सूचना दें और साइबर क्राइम पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें.
- बैंक जाकर अपने खाते के लिए हॉटलिस्ट/होल्ड (Hotlist/Hold) का अनुरोध करें और यूपीआई /नेटबैंकिंग की लिमिट घटवाएँ.
- सभी सबूत जैसे कॉल लॉग, ट्रांजैक्शन स्लिप, स्क्रीनशॉट इत्यादि को लेकर अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करें.
- सबसे जरूरी बात परिवार और सहकर्मियों को तुरंत बताएं, यदि कोई कहे ‘किसी को मत बताना’ तो समझें कि वही ठग हो सकता है.
अगर आप ठगी के शिकार हो गए हैं तो क्या करें?
यदि धोखाधड़ी हो जाए तो तुरंत ‘1930’ पर कॉल करें. इस नंबर पर शिकायत मिलते ही बैंक खातों को फ्रीज़ (Freeze) करने की कार्रवाई शुरू कर दी जाती है. कई मामलों में समय पर शिकायत करने पर कुछ या पूरा पैसा वापस भी मिल चुका है. साइबर क्राइम पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत करते समय पूरी और सही जानकारी जरूर अपलोड करें, जैसे भुगतान की तारीख व समय, जिस बैंक या यूपीआई आईडी पर पैसे गए, और कॉल रिकॉर्ड व अन्य सबूत (स्क्रीनशॉट, ट्रांजैक्शन रसीद आदि). यह सभी दस्तावेज़ पुलिस और बैंक को जल्दी और प्रभावी कदम उठाने में मदद करते हैं.
डिजिटल अरेस्ट पर कानून क्या कहता है?
हालांकि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के लिए कोई अलग कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन ऐसे मामलों में मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत धारा 66C लागू होती है, जो किसी की पहचान चोरी करने या उसका रूप धारण करने से जुड़ी है, और धारा 66D, जो कंप्यूटर या मोबाइल के माध्यम से की गई धोखाधड़ी (जैसे अफसर बनकर वीडियो कॉल पर ठगी करना) पर लागू होती है. वहीं, भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita), 2023 के तहत भी कई धाराएँ लागू होती हैं - जैसे धारा 318 (धोखाधड़ी), धारा 319 (किसी का रूप धारण कर धोखा देना), धारा 351 (आपराधिक धमकी देना), और धारा 308 (भय दिखाकर वसूली या ज़बरदस्ती वसूली). इन सभी धाराओं के तहत ऐसे ठगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
महाराष्ट्र साइबर की सलाह
‘डिजिटल अरेस्ट’ पूरी तरह से फर्जी और भ्रामक अवधारणा है, इसलिए ऐसे किसी कॉल या वीडियो कॉल पर बिल्कुल विश्वास न करें. यदि कोई संदिग्ध कॉल आए तो उसे तुरंत काट दें और राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें.
किसी भी स्थिति में किसी को पैसे, ओटीपी (OTP) या स्क्रीन शेयर न करें. ध्यान रखें, पुलिस या कोई सरकारी एजेंसी कभी भी व्हाट्सएप, वीडियो कॉल या ऑनलाइन चैट के जरिए गिरफ्तारी नहीं करती है. अगर कोई आपको डराकर पैसे मांगता है, तो समझिए कि वह एक साइबर ठग है. इसलिए हमेशा सतर्क और जागरूक रहें, और दूसरों को भी जागरूक करें - ताकि कोई और इस ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में न फँसे.













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