नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने एक महिला को उसके पति का कानूनी अभिभावक (लीगल गार्जियन) (Legal Guardianship) नियुक्त किया है, जो फरवरी 2025 में हुए भीषण ब्रेन हैमरेज के बाद से 'पर्सीस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (चेतना शून्य अवस्था) में हैं. कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों (Parens Patriae Jurisdiction) का उपयोग करते हुए यह आदेश दिया, ताकि मरीज के इलाज और वित्तीय मामलों का प्रबंधन सुचारू रूप से किया जा सके. न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने प्रोफेसर अलका आचार्य द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया.
याचिकाकर्ता के पति सलाम खान फरवरी 2025 में 'इंट्राक्रानियल हैमरेज' (दिमाग के अंदर रक्तस्राव) का शिकार हुए थे. आपातकालीन सर्जरी के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ और वे तब से अचेत अवस्था में हैं. यह भी पढ़ें: Delhi-Bombay High Court Bomb Threat: दिल्ली और बॉम्बे हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मामले में एफआईआर दर्ज
100 प्रतिशत विकलांगता और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट
जीबी पंत संस्थान (GIPMER) के मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि सलाम खान की विकलांगता का प्रतिशत 100% है और वे अपने जीवन का कोई भी निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं. बोर्ड के अनुसार, मरीज सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब और भोजन के लिए राइल्स ट्यूब पर निर्भर है और उन्हें निरंतर चिकित्सीय देखरेख की आवश्यकता है.
कानूनी रिक्तता और कोर्ट का हस्तक्षेप
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने टिप्पणी की कि भारत में 'वेजिटेटिव स्टेट' में रहने वाले व्यक्तियों की गार्जियनशिप को लेकर एक "कानूनी रिक्तता" (Legal Vacuum) है। कोर्ट ने उल्लेख किया कि 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' और 'मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017' जैसी वर्तमान कानूनी व्यवस्थाएं ऐसी स्थितियों के लिए पूर्ण तंत्र प्रदान नहीं करती हैं.
ऐसी स्थिति में, संवैधानिक न्यायालयों के पास यह अधिकार है कि वे व्यक्ति के कल्याण की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करें. एसडीएम (दक्षिण-पश्चिम) की जांच रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि पत्नी और पति के बीच कोई विवाद या हितों का टकराव नहीं है और पत्नी गार्जियन बनने के सभी मानदंडों को पूरा करती है.
संपत्ति और उपचार का अधिकार
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि दंपत्ति के दो वयस्क बच्चों ने अपनी मां को अभिभावक नियुक्त किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई और कोर्ट में अपनी सहमति दी.
अदालत के आदेश के बाद अब अलका आचार्य को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे, जैसे- पति के चिकित्सा उपचार और देखभाल से संबंधित सभी निर्णय लेना. बैंक खातों, निवेश, बीमा पॉलिसियों और अचल संपत्तियों का प्रबंधन करना. इसके साथ ही पति के चिकित्सा और दैनिक खर्चों के लिए उनकी संपत्ति का उपयोग करना.













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