लाल किले के पास हुए सोमवार के भयावह धमाके ने कई जिंदगियां हमेशा के लिए बदल दीं. इस विस्फोट में 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई घायल अब भी गंभीर स्थिति में हैं. अस्पताल में भर्ती पीड़ितों को दर्द, सुनने की क्षमता में कमी और मानसिक आघात जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है. डॉक्टरों के अनुसार, धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि कई मरीजों के कानों पर गहरा असर पड़ा है.
एलएनजेपी अस्पताल में इस हादसे के घायलों का इलाज जारी है. एक अधिकारी ने बताया कि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में 12 मरीज भर्ती हैं, जिनमें से चार आईसीयू में हैं, छह आइसोलेशन वार्ड में, चार न्यूरोसर्जरी यूनिट में और एक ट्रॉमा सेंटर में है. 28 वर्षीय मोहम्मद सफवान, जो चेन्नई के रहने वाले हैं, दोनों कानों में दर्द, पैर में सूजन और शरीर पर कई जगह चोटों से पीड़ित हैं. वहीं उत्तर प्रदेश के शिवा जायसवाल को दोनों कानों में सुनाई देने में दिक्कत, हाथ और चेहरे पर जलन और कई जगह चोटें आई हैं.
क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट्स
सर गंगाराम अस्पताल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉक्टर देविंदर राय ने बताया कि ऐसे उच्च तीव्रता वाले धमाकों में असर व्यक्ति की दूरी और संवेदनशीलता पर निर्भर करता है. उन्होंने कहा, “कुछ लोगों के कान ‘सॉफ्ट ईयर’ कहलाते हैं, यानी वे तेज आवाज से अधिक प्रभावित होते हैं. इस कारण कई लोगों को अस्थायी या स्थायी रूप से सुनने की क्षमता खोने का खतरा रहता है. कुछ मामलों में टिनिटस (कानों में लगातार बजने वाली आवाज) की समस्या भी हो सकती है.”
पहले मददगार बने स्थानीय लोग
धमाके के तुरंत बाद सबसे पहले स्थानीय लोग ही मौके पर पहुंचे और घायलों की मदद शुरू की. राजीव कुमार, जो लाल किले के पास कॉस्मेटिक की दुकान चलाते हैं, सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचे. वो बताते हैं, “पहले लगा कि सिलेंडर फटा है, लेकिन जब देखा कि लोग खून से लथपथ सड़क पर पड़े हैं, तो तुरंत एक घायल व्यक्ति को उठाया. वो दर्द से तड़प रहा था.”
राजीव ने बताया कि वो दो रातों से सो नहीं पाए, “मैं बस यह जानना चाहता था कि जिस व्यक्ति को मैंने बचाया था, वह जिंदा है या नहीं. ऐसी घटना देखने के बाद नींद नहीं आती.”
हाथों में उठाए शरीर के हिस्से... रेस्क्यू टीम की दहला देने वाली कहानी
एम्बुलेंस चालक फिजान ने बताया कि उसने कई घायलों को अस्पताल पहुंचाया. उनकी आंखों के सामने दर्दनाक दृश्य थे. उन्होंने कहा, “मैंने अपने हाथों में शरीर के हिस्से उठाए. वे कांप रहे थे. चारों तरफ धुएं और जले हुए लोहे की गंध थी.”
उनके साथी इमरान ने बताया, “हम बस लोगों को उठाते जा रहे थे. कुछ लोग हिल भी नहीं रहे थे, कुछ दर्द से चिल्ला रहे थे.”
मानसिक घाव जो जल्दी नहीं भरेंगे
डॉक्टरों का कहना है कि शारीरिक घाव समय के साथ ठीक हो सकते हैं, लेकिन इस तरह की घटनाओं से होने वाला मानसिक आघात सालों तक लोगों को परेशान करता है. लाल किले धमाके के पीड़ितों के लिए ज़िंदगी अब पहले जैसी नहीं रही. दर्द, डर और उस रात की यादें उन्हें बार-बार झकझोर देती हैं.













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