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बीजेपी के पास फिर हो सकता है जम्मू, लेकिन कश्मीर है चुनौती

जम्मू-कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनाव में केंद्र शासित प्रदेश के राजनीतिक दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है. जहां भाजपा जीत हासिल करने की तैयारियों में जुटी हुई है, वहीं अब्दुल्ला, मुफ्ती और दूसरे नेता फिर से सत्ता पर कब्जा जमाने का ख्वाब देख रहे हैं.

बीजेपी के पास फिर हो सकता है जम्मू, लेकिन कश्मीर है चुनौती
बीजेपी (Photo Credits: Twitter)

नई दिल्ली, 4 सितंबर : जम्मू-कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनाव में केंद्र शासित प्रदेश के राजनीतिक दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है. जहां भाजपा जीत हासिल करने की तैयारियों में जुटी हुई है, वहीं अब्दुल्ला, मुफ्ती और दूसरे नेता फिर से सत्ता पर कब्जा जमाने का ख्वाब देख रहे हैं. भाजपा ने 2014 के विधानसभा चुनावों में तत्कालीन जम्मू और कश्मीर राज्य में 'मिशन 44-प्लस' के साथ 87 सदस्यीय सदन में बहुमत हासिल करने के अपने इरादे को चिन्हित किया है. तब भाजपा ने 25 सीटें जीती थी. भाजपा का उदय जम्मू-कश्मीर में तो हुआ, लेकिन वह कश्मीर में कुछ भी हासिल नहीं कर पाई. हिंदू-बहुल जम्मू में जहां जीत दिलवाकर लोगों ने पार्टी का स्वागत किया, वहीं मुस्लिम बहुल कश्मीर ने बड़ी संख्या में पार्टी को 'ना' कह दिया. आज, जब विधानसभा चुनाव की चर्चा हो रही है, जम्मू में 25 सीटों पर बने रहने के लिए और कश्मीर में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए भाजपा पूरी तरह से तैयार है. 2020 में पहली बार डीडीसी चुनावों में, जो एक मिनी विधानसभा चुनाव की तरह थे, भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जबकि पीडीपी और कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. भाजपा ने 140 में से तीन सीटें जीतकर घाटी में प्रवेश किया.

इससे भाजपा को उम्मीद की एक किरण दिखाई दी, लेकिन मुस्लिम बहुल घाटी के राजनीतिक क्षेत्र में पैठ बनाना भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता है. 2011 की जनगणना के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश में मुसलमान 69 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन एक क्षेत्रीय विभाजन भी है. सिर्फ कश्मीर की बात करें तो यहां 96 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है और केवल 2.5 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि जम्मू में 62 प्रतिशत से अधिक हिंदू हैं और 33.5 प्रतिशत मुसलमान हैं. यह धार्मिक विभाजन ही है जो उस समय के परिणामों में दिखा. 2014 में देश में आई मोदी लहर ने जम्मू-कश्मीर के हिंदू बहुल इलाकों को भी पछाड़ दिया, जिससे बीजेपी को 37 में से 25 सीटें मिलीं.

अगर केंद्र शासित प्रदेश में आज चुनाव होते हैं तो क्या ऐसी ही स्थिति सामने आएगी?

केंद्र में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के आने के बाद जम्मू के लिए चीजें बदल गई हैं. अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर की स्थिति बदलने से पहले, जम्मू और लद्दाख केंद्र के फोकस में नहीं थे. राज्य के विघटन के बाद अब लद्दाख की अपनी स्वतंत्र पहचान है, जबकि जम्मू ने भाजपा को व्यापक समर्थन दिया है. परिसीमन के बाद जम्मू में विधानसभा सीटों की संख्या में छह और कश्मीर में एक की वृद्धि हुई है. जम्मू को विकास का अपना हिस्सा मिला है, जो पिछली सरकारों में कश्मीर को मिलता था. जम्मू को भी एम्स, आईआईटी, औद्योगिक क्षेत्र समेत कई लाभ मिले. 2014 में जो हुआ, वह 2019 के लोकसभा चुनाव में दोहराया गया. भाजपा ने जम्मू में दो लोकसभा सीटें जीतीं और संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में अपने वोट शेयर में भी सुधार किए, जो 2014 में 34.40 प्रतिशत से 2019 में 46.4 प्रतिशत हो गया.

जम्मू में पार्टी की जड़ें मजबूत हो गई. जम्मू पहला स्थान था जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यात्रा की और 27 अप्रैल को अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद एक विशाल सभा को संबोधित किया, जिससे उनके समर्थन आधार को उचित महत्व दिया गया. परिसीमन और मतदाता सूची के अपडेशन के बाद जम्मू में भाजपा की संभावनाएं और बेहतर होंगी. नए मतदाताओं के अलावा, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) से आए 54,945 शरणार्थी परिवारों को भी 75 साल में पहली बार विधानसभा चुनाव में वोट देने का अधिकार मिलेगा. तो क्या हजारों वाल्मीकि, जिन्हें पहले के शासकों द्वारा जम्मू-कश्मीर में पंजाब से सफाई कर्मचारी और मैला ढोने वालों के रूप में काम करने के लिए लाया गया था, भाजपा उन्हें स्थानीय चुनावों में वोट देने का अधिकार को लेकर आश्वस्त करेगी.

जहां जम्मू भाजपा का पसंदीदा बना हुआ है, वहीं कश्मीर चुनौती है. कश्मीर घाटी की 47 सीटों पर बीजेपी के लिए खाता खोलना आसान नहीं होगा. भाजपा पार्टी को बड़े पैमाने पर हिंदू समर्थक के रूप में देखा जाता है. कश्मीर के मुस्लिम बहुमत का वोट पारंपरिक दल नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी या अन्य के पक्ष में जाने की संभावना है. आतंकवाद पर अभी भी अंकुश नहीं लगा है, जिसके चलते लोगों के मन में बंदूक का खौफ कायम है. घाटी के लोगों ने कश्मीरी पंडितों, गैर-स्थानीय लोगों, पुलिसकर्मियों, भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं की हत्याएं देखी हैं. पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी लॉबी को काफी हद तक रोक दिया गया है, जिससे पथराव और हर दिन बंद के आह्वान में कमी आई है. लेकिन बढ़ती कट्टरता और सदियों पुराने सूफीवाद का पतन, भाजपा को बड़े पैमाने पर घाटी में प्रवेश करने से रोक रहा है.

कश्मीर भाजपा के पक्ष में नजर नहीं आ रहा है, जिसके चलते पार्टी को सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा हासिल करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. इसलिए, भाजपा के पास कश्मीर में सत्ता हासिल करने के लिए गठबंधन का साथ लेना होगा. शायद भाजपा को गुलाम नबी आजाद के राजनीतिक क्षेत्र में आने से फायदा हो सकता है. अपनी पार्टी और सज्जाद लोन की पार्टी भी है, जिसे आम तौर पर केंद्र के समर्थन के रूप में देखा जाता है. भाजपा के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव देश और दुनिया को दिखाने के लिए एक मिशन हो सकता है.

(The above story first appeared on LatestLY on Sep 04, 2022 03:06 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).