संगीतकार जयदेव की 100 वीं वर्षगांठ पर उनकी जिंदगी का सफर
हिंदी सिनेमा संगीत की दुनिया में चुनिंदे संगीतकार ही ऐसे हैं, जिन्हें संगीत-विशेषज्ञ के तौर पर प्रामाणिक धुन बनाने वाले के तौर पर शिद्दत से याद किया जाता है. जयदेव इसी कैटगरी के संगीतकार थे, जिनकी धुनों में शास्त्रीयता और लोक परम्परा का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है. जयदेव दूसरे संगीतकारों की तुलना में काफी अलग हैं.
हिंदी सिनेमा संगीत की दुनिया में चुनिंदे संगीतकार ही ऐसे हैं, जिन्हें संगीत-विशेषज्ञ के तौर पर प्रामाणिक धुन बनाने वाले के तौर पर शिद्दत से याद किया जाता है. जयदेव (Jaidev) इसी कैटगरी के संगीतकार थे, जिनकी धुनों में शास्त्रीयता और लोक परम्परा का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है. जयदेव दूसरे संगीतकारों की तुलना में काफी अलग हैं. उन्होंने शास्त्रीय धुनों को अपनी विशिष्ठ कला में ढालते हुए मेलोडी को भी प्रमुखता से जगह दिया है. उनका कम्पोजिशन जटिल होते हुए भी आसानी से संगीत का रसास्वादन करा जाता है.आज दुनिया भर के संगीतप्रेमी स्व. संगीतकार जयदेव कीसौवीं वर्षगांठ सेलीब्रेट कर रहे हैं. एक नजर इस महान संगीतकार के करियर के सफर पर..
फिल्मस्टार बनने की दीवानगी ले आई बंबई
जयदेव का परिवार मूलतः नैरोबी का रहनेवाला था, जो बाद में हिंदुस्तान (लुधियाना) शिफ्ट हो गया. जयदेव के जन्म स्थल एवं जन्म वर्ष को लेकर कुछ भ्रांतियां हैं कि वे नैरोबी में जन्में, या फिर लुधियाना में. कहीं उनका जन्म 3 अगस्त 1918 तो कहीं 3 अगस्त 1919 माना जाता है. खूबसूरत शख्सियत वाले जयदेव वर्मा हिंदी सिनेमा में फिल्मस्टार बनना चाहते थे और जैसा कि अकसर होता है, फिल्मों की चाहत रखनेवाला बिना भविष्य की चिंता किये घर-बार छोड़कर बंबई (मुंबई) आ धमकता है. 15 वर्षीय किशोरवय के जयदेव भी 1934 में घर से भागकर बंबई आ गये. लेकिन यह उनकी खुशनसीबी थी कि बंबई में उन्हें वाडिया फिल्म कंपनी का सहारा मिला. उन्हें एक-दो नहीं 8 फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करने का अवसर मिला. लेकिन ऊंची उड़ान के मंसूबे से घर छोड़कर मुंबई आनेवाले जयदेव लाइट.. कैमरा... साउंड.. की लक्ष्मण रेखा में ज्यादा दिन टिक नहीं सके. अपने बीमार पिता को देखने वे वापस लुधियाना आ गये. पिता के अचानक निधन और घर-परिवार की जिम्मेदारी ने उनके भीतर एक्टर बनने के भूत को दफन कर दिया.
नये जोश और जुनून के साथ बंबई आगमन
साल 1943 में बहन की शादी करने के पश्चात जयदेव संगीतकार नौशाद के गृहनगर लखनऊ आ गये. यहां उन्होंने सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद अली अकबर खान से संगीत की तालीम लेनी शुरू की. उस्ताद अली अकबर खान को नवकेतन फिल्म्स कंपनी ने अपनी दो फिल्मों 'आंधिया' और 'हमसफर' के लिए धुनें बनाने की जिम्मेदारी सौंपी तो अकबर खान जयदेव को अपना सहायक बनाकर बंबई लिवा आये. जयदेव की संगीत प्रतिभा को नवकेतन फिल्म्स कंपनी ने भी परखा. यही वजह थी कि नवकेतन फिल्म्स ने जब फिल्म‘टैक्सी ड्राइवर’ बनाई तो जयदेव को इस फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन का भी सहायक बनाया.
हिंदी सिनेमा की गुटबंदी और जयदेव
उन दिनों हिंदी सिनेमा जगत में गुटबंदी का दौर खूब फल-फूल रहा था. हर प्रोडक्शन कंपनी के अपने गीतकार, गायक, कथा, पटकथाकार और निर्देशक आदि होते थे. नवकेतन प्रोडक्शन कंपनी जयदेव की प्रतिभा से प्रभावित थी. उन्हें लगा कि इस युवा संगीतकार को अगर तैयार किया जाए तो आगे चलकर कंपनी के लिए यह काफी लाभदायक साबित हो सकता है. लिहाजा नवकेतन फिल्म्स कंपनी ने जयदेव को साल 1955 में बतौर स्वतंत्र संगीतकार दो फिल्मों 'जोरू का भाई' और 'अंजली' की जिम्मेदारी सौंपी. दुर्भाग्यवश दोनों ही फिल्में फ्लॉप हुईं. लेकिन फिल्म के संगीत की सर्वत्र प्रशंसा हुई.
नवकेतन फिल्म्स को जयदेव की प्रतिभा पर कोई शक-सुबहा नहीं था.
माइल स्टोन बनी 'हम दोनों'
नवकेतन फिल्म्स की अगली फिल्म 'हम दोनों' (1961) का संगीत की जिम्मेदारी भी जयदेव को सौंपी गई. यह फिल्म सुपर-डुपर हिट हुई. इस फिल्म के सभी गाने ( 'अभी न जाओ छोड़कर...', 'मैं जिंदगी का साथ निभाता...', 'कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया...', 'अल्ला तेरो नाम...') सुपर-डुपर हिट हुए. दस साल के अथक संघर्ष के बाद मिली इस सफलता ने उन्हें अपनी पहचान दिलाई, जिसकी चाहत लेकर वे बंबई आये थे. जयदेव से प्रभावित सुनील दत्त ने भी उन्हें अपने बैनर अजंता आर्ट्स में शामिल कर लिया. इस बैनर की फिल्म ‘मुझे जीने दो’ ने संगीतकार जयदेव को एक अलग तरह के संगीतकार की पहचान दिलाई.
प्रयोगधर्मी संगीतकार
जयदेव हमेशा से प्रयोगधर्मी संगीतकार रहे हैं. वह हर फिल्म में संगीत प्रेमियों को कुछ नया देने की कोशिश करते थे. उनके द्वारा रचित संगीत की खासियत यह होती थी कि वह शास्त्रीय राग, रागिनियों और लोकधुनों का इस खूबसूरती से मिश्रण करते थे. ‘प्रेम परबत’ के गीत 'ये दिल और उनकी पनाहों के साये...' में उन्होंने पहाड़ी लोकधुन का इस्तेमाल करते हुए संतूर जैसे वाद्य यंत्र का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है.मानों पहाड़ों से नदी बलखाती हुई आगे बढ रही हो. कुछ ऐसाही प्रयोग उन्होंने फिल्म ‘दो बूंद पानी’ के एक गाने, ‘पीतल कीमोरी गागरी..’ में किया था, जो आपको राजस्थानी फ्लैवर के बीच पहुंचा देता है. 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘किनारे-किनारे’का देव आनंद पर फिल्माए गानों के बैकग्राउंड के लिएजयदेव ने तलत महमूद, मो. रफी, मन्ना डे और मुकेश कीआवाजों का प्रयोग किया था. जयदेव धुनों में ही नया प्रयोगनहीं करते थे बल्कि उभरती नयी प्रतिभाओं को भी उन्होंनेखूब मौका दिया. दिलराज कौर, भूपेन्द्र, रूना लैला, पीनाज मसानी, सुरेश वाडेकर, परवीन सुल्तान जैसे नवोदित गायकों को उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए उनसे अच्छे गाने गवाये.
सूर्यास्त के बाद आगमन चमकते सूर्योदय का
इस इंडस्ट्री का सबसे बुरा पहलू यह है कि यहां उगते सूरज की पूजा होती है. भले ही वह प्रतिभाहीन क्यों न हो, उसके सामने टैलेंटेड और अनुभवी लोग भी नजरंदाज कर दिये जाते हैं. ऐसे दौर से जयदेव भी गुजरे हैं. सन 70 के दशक में जयदेव की कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से असफल हुई, जिसका परिणाम यह हुआ कि किसी समय उनके इर्द-गिर्द घूमने वाले निर्माता भी उनसे कटने लगे. लेकिन प्रतिभा ज्यादा समय तक भाग्य के हाथों मजबूर नहीं रह सकती.1977 में रिलीज हुई ‘घरौंदा’ (एक अकेला इस शहर में.., मुझे प्यार तुमसे नहीं है..) और 1978 की ‘गमन’ (‘सीने में जलन आंखों में तूफान..’ एवं आपकी याद आती रही...’) एक बार फिर लोगों के सर चढ़ कर बोला. हैरानी की बात यह थी कि जयदेव ने उस समय चल रहे संगीत के ट्रेंड को बिना छुए अपनी परंपरागत संगीत को ही तरजीह देते हुए श्रोताओं का दिल जीता.